-विधवा मां की करुण पुकार; रूस के युद्ध मोर्चे पर पांच भारतीय
-युवकों की जिंदगी दांव पर, तीन का दो महीने से कोई सुराग नहीं!
विशाखापत्तनम। एक मां ने अपने जवान बेटे को विदेश इसलिए भेजा था कि वह चार पैसे कमाकर घर की बदहाली दूर करेगा। पिता का साया पहले ही सिर से उठ चुका था। मां को उम्मीद थी कि बेटा परिवार का सहारा बनेगा, बहन की जिम्मेदारियां उठाएगा और घर में खुशियां लौटाएगा। लेकिन किस्मत ने ऐसा क्रूर मोड़ लिया कि अब वह उसी बेटे के जिंदा लौटने की दुआ मांग रही है। विधवा मां की बस एक ही गुहार है- ‘मेरा पति भी नहीं रहा, अब मेरा बेटा तो लौटा दो!’
आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम निवासी १९ वर्षीय जे. वामसी की कहानी रोंगटे खड़े कर देने वाली है। वामसी रोजगार की तलाश में रूस गया था। उसे उम्मीद थी कि वहां फलों की पैकिंग का काम मिलेगा। लेकिन आरोप है कि नौकरी दिलाने के नाम पर उसके साथ धोखा हुआ। रूस में मिले एक नेपाली नागरिक ने सेना के लिए खाद्य सामग्री पैक करने की नौकरी का भरोसा दिया। वामसी उसके झांसे में आ गया। मगर फल और खाने-पीने की चीजें पैक करने के बजाय उसे रूसी सेना में भर्ती करा दिया गया।
वामसी ने आरोप लगाया कि उनसे रूसी भाषा में लिखे दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कराए गए। बाद में बताया गया कि वे रूसी नागरिक बन चुके हैं और भारत नहीं लौट सकते। इस दावे की आधिकारिक पुष्टि अभी बाकी है।
मां ने लगाई केंद्र-राज्य सरकार से गुहार
वामसी की मां जे. अप्पालाकोंडा ने केंद्र सरकार, मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू, उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण और मंत्री नारा लोकेश से बेटे को सुरक्षित वापस लाने की अपील की है। मॉस्को स्थित भारतीय दूतावास ने भी युवकों की रिहाई का मामला रूसी रक्षा मंत्रालय के सामने उठाया है। लेकिन एक मां के लिए सरकारी पत्राचार से बढ़कर उसके बेटे की जिंदगी है। उसे न युद्ध की राजनीति समझनी है, न रूस और यूक्रेन का विवाद। वह सिर्फ अपने बेटे को वापस चाहती है।
