-बंगाल में एसआईआर का न्याय ठप, आधार
-प्रमाणीकरण के विरोध में न्यायाधीशों ने बंद किया पोर्टल पर लॉग-इन; लाखों अपीलें अब भी लंबित
सामना संवाददाता / नई दिल्ली
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से लाखों लोगों के नाम हटाने के बाद अब उनके मतदान के अधिकार की लड़ाई भी चुनाव आयोग की तकनीकी शर्तों में उलझ गई है। हैरानी की बात यह है कि जिन न्यायिक अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट ने मतदाताओं की अपीलों पर फैसला सुनाने की जिम्मेदारी सौंपी है, उन्हीं न्यायाधीशों को चुनाव आयोग के पोर्टल पर अपनी पहचान साबित करने के लिए आधार, पैन और सरकारी पहचान पत्र जैसी औपचारिकताओं से गुजरना पड़ रहा है। सवाल उठ रहा है कि जब न्याय देने वाले जज ही चुनाव आयोग की तकनीकी व्यवस्था में उलझ जाएंगे तो आम मतदाता को इंसाफ कैसे मिलेगा?
आधार प्रमाणीकरण पर अड़े न्यायाधीश
पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के तहत मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के खिलाफ दाखिल अपीलों पर सुनवाई के लिए अपीलीय न्यायाधिकरण गठित किए गए हैं। इन न्यायाधिकरणों में न्यायिक अधिकारी मतदाताओं की शिकायतों पर सुनवाई कर रहे हैं। लेकिन चुनाव आयोग की तकनीकी व्यवस्था ने इस प्रक्रिया में नई अड़चन खड़ी कर दी है। दरअसल, २१ सितंबर को चुनाव आयोग ने अपने पोर्टल पर अंतिम आदेश जारी करने के लिए आधार प्रमाणीकरण की व्यवस्था लागू की थी। न्यायाधीशों ने इस व्यवस्था पर आपत्ति जताते हुए पोर्टल पर लॉग-इन करना बंद कर दिया। इसके चलते २१ सितंबर से अंतिम आदेश अपलोड करने की प्रक्रिया ठप पड़ी है। यानी सुनवाई के बाद भी फैसलों को अंतिम रूप देने और उन्हें पोर्टल पर दर्ज करने में बाधा आ रही है।
अब डिजिटल हस्ताक्षर का नया पेंच
न्यायिक अधिकारियों की आपत्ति के बाद चुनाव आयोग ने अब दूसरा रास्ता निकाला है। आयोग ने न्यायाधीशों से पैन कार्ड और सरकारी पहचान पत्र के आधार पर डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाणपत्र बनवाने को कहा है। इसके लिए उन्हें अपनी फोटो, मोबाइल नंबर और ईमेल का विवरण देने के साथ वीडियो सत्यापन की प्रक्रिया भी पूरी करनी होगी। प्रत्येक डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाणपत्र की सरकारी दर २,३०० रुपये बताई गई है। हालांकि, सवाल यह है कि न्यायिक अधिकारियों की पहचान और उनकी आधिकारिक हैसियत पहले से स्थापित होने के बावजूद उन्हें इस तरह की अतिरिक्त तकनीकी औपचारिकताओं से क्यों गुजरना पड़ रहा है? क्या चुनाव आयोग अपनी व्यवस्था को न्यायिक प्रक्रिया के अनुरूप बनाने के बजाय न्यायिक अधिकारियों को ही अपनी शर्तों के अनुसार काम करने के लिए मजबूर कर रहा है?
३८ लाख अपीलें, निपटारा महज १.२६ लाख का!
इस पूरे विवाद का सबसे चिंताजनक पहलू लंबित अपीलों की भारी संख्या है। चुनाव आयोग की ओर से सितंबर में सुप्रीम कोर्ट को उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के मुताबिक, कुल ३८.३१ लाख अपीलें दाखिल हुई थीं, लेकिन इनमें से केवल १.२६ लाख अपीलों का ही निपटारा हो सका था।
‘तीन करोड़ वोटर घुसपैठिए, तो २०१४ के बाद की सरकारें वैध कैसे?’
राजनीतिक विश्लेषक और लेखक परकाला प्रभाकर ने देश की चुनावी प्रक्रिया और मौजूदा राजनीतिक माहौल को लेकर एक तीखा सवाल उठाया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के पति ने पूछा है कि यदि मतदाता सूचियों से हटाई गई भारी संख्या में प्रविष्टियों को लेकर दावे किए जा रहे हैं, तो क्या २०१४ के बाद देश में बनी सरकारें भी अवैध मानी जानी चाहिए? हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने चुनावी सूचियों से हटाए गए तीन करोड़ मतदाताओं को लेकर बड़ा दावा किया था। उन्होंने इन्हें कथित तौर पर `बांग्लादेश से आए अवैध घुसपैठिए’ करार दिया था। इसी टिप्पणी पर पलटवार करते हुए परकाला प्रभाकर ने यह तीखा सवाल खड़ा किया है।
