-केंद्र बोला, उन्हें केवल हटाया गया था!
-चुनाव आयोग विरोधी आंदोलन पर सुप्रीम कोर्ट में पुलिस कार्रवाई, बैरिकेडिंग और नागरिक अधिकारों को लेकर तीखी बहस
चुनाव आयोग विरोधी आंदोलन पर सुप्रीम कोर्ट में पुलिस कार्रवाई, बैरिकेडिंग और नागरिक अधिकारों को लेकर तीखी बहस
नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान हजारों लोगों को कथित रूप से हिरासत में लेने का मामला मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में गूंजा। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को बड़े पैमाने पर पकड़ा, उनके साथ बल प्रयोग किया और लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार पर प्रतिबंध लगाए। केंद्र सरकार ने इन आरोपों का विरोध करते हुए कहा कि प्रदर्शनकारियों को हिरासत में नहीं लिया गया था, बल्कि उन्हें प्रदर्शनस्थलों से हटाया गया था। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ विरोध प्रदर्शनों से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ताओं ने अदालत के सामने कथित सामूहिक हिरासत, पुलिस की सख्ती, मेट्रो स्टेशनों पर पाबंदियों, इंटरनेट बंद करने और प्रदर्शनस्थलों की निगरानी का मुद्दा उठाया। सुनवाई में लगभग सात हजार लोगों को हिरासत में लेने का दावा भी सामने आया। हालांकि इस संख्या की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सरकार का पक्ष रखते हुए हिरासत के आरोपों से इनकार किया। उन्होंने कहा कि प्रदर्शनस्थलों से लोगों को हटाए जाने की कार्रवाई को हिरासत बताना सही नहीं है। इस विवाद का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि पुलिस द्वारा किसी व्यक्ति को प्रदर्शनस्थल से हटाने और उसकी स्वतंत्र आवाजाही रोकने के बीच कानूनी अंतर क्या है। कानूनसम्मत और अनुपातिक थीं या नहीं।
