मुख्यपृष्ठनए समाचारमुख्य चुनाव आयुक्त की पुरानी फाइल फिर खुली!

मुख्य चुनाव आयुक्त की पुरानी फाइल फिर खुली!

-केरल विजिलेंस को २००६ के दो करोड़ रुपए रिश्वत आरोप की प्रारंभिक जांच -मलेशियाई इंजीनियर की आत्महत्या से जोड़ा गया दावा

सामना संवाददाता / तिरुवनंतपुरम

केरल सरकार ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध वर्ष २००६ से जुड़े रिश्वत के नए आरोप की प्रारंभिक जांच विजिलेंस एंड एंटी करप्शन ब्यूरो को सौंप दी है। शिकायत में आरोप है कि लोक निर्माण विभाग के सचिव रहते हुए कुमार ने सड़क परियोजना के बकाया बिल जारी करने के लिए दो करोड़ रुपए की मांग की थी। शिकायतकर्ता ठेकेदार ने इस कथित मांग को मलेशियाई इंजीनियर ली सी बीन की आत्महत्या से जोड़ा है। इंजीनियर भारत-मलेशिया संयुक्त उद्यम द्वारा संचालित सड़क परियोजना से जुड़े थे। दावा है कि भुगतान रुकने और कथित रिश्वत मांगने से वे दबाव में थे। आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है और प्रारंभिक जांच दोषसिद्धि अथवा प्राथमिकी के बराबर नहीं है। ज्ञानेश कुमार को आरोपों का उत्तर देने और जांच में अपना पक्ष रखने का पूरा अधिकार है। पुराने मामले में दस्तावेजों, भुगतान फाइलों, अधिकारियों की भूमिका और कथित सुसाइड नोट की प्रामाणिकता की जांच आवश्यक होगी।
-चुनावी डर से झुकी मोदी सरकार!
-अग्निवीरों की सेवा में दो साल की बढ़ोतरी!!
-कांग्रेस बोली, `चुनाव आते ही याद आया युवाओं का भविष्य!’
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी को अग्निवीर योजना की याद सताने लगी है। युवाओं में अग्निपथ योजना को लेकर लंबे समय से जारी नाराजगी के बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की घोषणाओं को चुनावी दांव के तौर पर देखा जा रहा है। सवाल उठ रहा है कि क्या बीजेपी को अग्निवीरों और सेना में भर्ती की तैयारी कर रहे युवाओं की नाराजगी का डर सताने लगा है?
अग्निपथ योजना के तहत सेना में चार साल की सेवा और उसके बाद अधिकांश अग्निवीरों की विदाई को लेकर शुरुआत से ही सवाल उठते रहे हैं। युवाओं का आरोप है कि वर्षों तक सेना में भर्ती की तैयारी करने के बाद भी उन्हें स्थायी रोजगार की गारंटी नहीं मिलती। कांग्रेस समेत विपक्षी दल भी इस योजना को युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ बताते रहे हैं। अब चुनाव से पहले योगी सरकार की ओर से अग्निवीरों के लिए घोषणाएं किए जाने को बीजेपी की डैमेज कंट्रोल कवायद माना जा रहा है। राजनीतिक जानकारों के बीच चर्चा है कि रोजगार और सेना में भर्ती का मुद्दा चुनाव में बीजेपी के लिए मुश्किल खड़ी कर सकता है।
चार साल का धोखा, अब चुनावी घोषणाओं का सहारा
ऐसे में सवाल है कि युवाओं को चार साल की अनिश्चित सेवा में धकेलने के बाद अब घोषणाओं से उनका भरोसा जीतने की कोशिश क्यों हो रही है? क्या ये पैâसले युवाओं के भविष्य की चिंता हैं या फिर यूपी चुनाव से पहले वोटों की फसल काटने का नया सियासी हथकंडा?

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