सुनील ओसवाल / मुंबई
चुनावों के नतीजों के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में शांति नहीं, बल्कि अस्थिरता के संकेत उभरने लगे हैं। भाजपा सबसे बड़ा दल बनकर सामने आई है, लेकिन बहुमत के बावजूद सत्ता गठन सहज होने के बजाय अब टकराव की दिशा में बढ़ता दिख रहा है। भाजपा और शिंदे गुट के बीच सत्ता के बंटवारे, मेयर पद और राजनीतिक मान-सम्मान को लेकर खींचतान खुलकर सतह पर आने लगी है।
ठाणे और मुंबई दोनों ही जगहों पर यह साफ हो चुका है कि शिंदे गुट महापौर पद पर अपना दावा ठोक रहा है। दूसरी ओर, सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते भाजपा अपना ‘स्वाभाविक अधिकार’ मान रही है। यहीं से तनाव की शुरुआत होती है। भाजपा विधायक संजय केलकर ने कहा कि उचित मान-सम्मान नहीं मिला तो अलग रास्ते पर सोचेंगे’। केलकर का यह बयान टकराव के संकेत दे रहा है। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि शिंदे गुट ने अपने नवनिर्वाचित नगरसेवकों को एकजुट रखने के लिए होटल में ठहराने जैसी रणनीति अपनाई है। इसे केवल संगठनात्मक कदम बताने की कोशिश की जा रही है, लेकिन इसके राजनीतिक मायने गहरे हैं। सवाल उठ रहा है, क्या शिंदे गुट को अपने ही नगरसेवकों पर भरोसा नहीं? और क्या यह कदम आने वाले सत्ता संघर्ष की तैयारी है? महापालिका नतीजों ने यह भी स्पष्ट किया है कि गठबंधन की जीत के बावजूद अंदरूनी असंतोष दबा नहीं है। शिंदे गुट यह जताने में लगा है कि शहरी सत्ता में उसकी अनदेखी नहीं की जा सकती, वहीं भाजपा अपने जनादेश को ताकत मानते हुए समझौते के मूड में नहीं दिख रही। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, यह टकराव केवल पदों का नहीं, बल्कि वर्चस्व का है।
