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राय गैर की मानकर…

राय गैर की मानकर, बांट लिया घर-द्वार,
अपने हाथों तोड़ते, खुद रिश्तों का प्यार।।
गलती क्या थी प्रेम की, क्यों पलटे संस्कार,
अपने कांटे बन गए, पराये लगे बहार।
घर के आंगन जल उठे, टूटे सब व्यवहार
अपने हाथों तोड़ते, खुद रिश्तों का प्यार।।
भाई-भाई लड़ पड़े, दौलत की दीवार,
माँ की सूनी आंख में, तैर रहा अंगार।
रिश्तों की चौपाल पर, उग आया ही खार
अपने हाथों तोड़ते, खुद रिश्तों का प्यार।।
राय गैर की मानकर, भूल गए पहचान,
जिनसे था जीवन जुड़ा, उठे उन्हीं पर बाण।
मतलब के इस दौर में, मरता हर संस्कार
अपने हाथों तोड़ते, खुद रिश्तों का प्यार।।
अपने अब अपने कहां, चेहरे सब दोरंग,
भीतर नफरत पालते, ऊपर मीठे संग।
विश्वासों की लाश पर, गुमसुम है ऐतबार
अपने हाथों तोड़ते, खुद रिश्तों का प्यार।।
सौरभ कहे बचाइए, रिश्तों की यह डोर,
वरना सूना ही रहे, जीवन का हर छोर।
अपने अब अपने कहां, बन बैठे गद्दार
अपने हाथों तोड़ते, खुद रिश्तों का प्यार।।
-डॉ. प्रियंका सौरभ

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