अनिल तिवारी
कभी अमेरिका को शालीनता, अनुशासन और लोकतांत्रिक मर्यादा का उपदेशक माना जाता था। लेकिन अब लगता है कि वहां भी शालीनता का बुर्का जगह-जगह से फटने लगा है। व्हाइट हाउस करेस्पॉन्डेंट्स डिनर में ट्रंप को सुरक्षा घेरे में बाहर निकाले जाने की अफरातफरी के बीच एक वायरल वीडियो में यह भी सामने आया कि कुछ प्रेस सदस्य कथित तौर पर वाइन की बोतलें समेटते दिखे। यानी गोलियां चल रही थीं, सुरक्षा एजेंसियां दौड़ रही थीं और लोकतंत्र के प्रहरी बोतलों की सुरक्षा में जुटे थे।
यह दृश्य बताता है कि भूख और लालच का कोई राष्ट्रधर्म नहीं होता। पाकिस्तान में प्रेस कॉन्प्रâेंस शादियों और कार्यक्रमों में खाने की छीना-झपटी के किस्से सुनने को मिलते हैं, हिंदुस्तान भी इससे अछूता नहीं है। लेकिन अमेरिका? वही अमेरिका, जो दुनिया को सभ्यता का प्रमाणपत्र बांटता फिरता है? अब वहां भी नया ‘न्यू नॉर्मल’ सेट होता दिख रहा है। ट्रंप का लालची, आक्रामक और प्रदर्शनप्रिय राजनीतिक स्वभाव शायद अब अमेरिकी सार्वजनिक जीवन में भी उतर रहा है। जब नेता मर्यादा को तमाशा बना दें, तो संस्थाएं भी धीरे-धीरे बाजार, भोज और बोतल के बीच फर्क भूलने लगती हैं।
वैसे यह बीमारी केवल अमेरिका की नहीं। भारत में भी राजनीति का नया न्यू नॉर्मल बन चुका है, दल तोड़ो, जनप्रतिनिधियों को डराओ, जांच एजेंसियों को राजनीतिक डंडा बनाओ और फिर भ्रष्टाचारियों को ‘कमल छाप साबुन’ से धोकर पवित्र घोषित कर दो। शिष्टाचार, नैतिकता, जवाबदेही और जिम्मेदारी अब पुराने जमाने की चीजें मानी जाने लगी हैं। तो फिर मोदी जी के ‘डियर प्रâेंड’ ट्रंप का देश पीछे क्यों रहे? वहां भी लोकतंत्र के डिनर में अब बहस कम, बोतल ज्यादा दिख रही है। फर्क बस इतना है कि पहले अमेरिका दुनिया को लोकतंत्र का पाठ पढ़ाता था, अब शायद दुनिया उसे आईना दिखाने लगी है।
