-एसआई की बेटी का दावा-भीड़ ने पिता को घसीटकर अधमरा किया, चार घंटे बेहोश रहे; सवाल- क्या पूरी पीढ़ी को ‘नल्ला और गालीबाज’ बताना जायज है?
सामना संवाददाता / नई दिल्ली
जंतर-मंतर पर हुए सीजेपी छात्र आंदोलन के बाद जेन-जी को कटघरे में खड़ा करने की मुहिम और तेज होती दिखाई दे रही है। भाजपा सांसद कंगना रनौत की ‘जेनरेशन गटर’ टिप्पणी के बाद अब प्रदर्शन के दौरान घायल हुए दिल्ली पुलिसकर्मियों के परिजन सामने आए हैं। प्रेस कॉन्प्रâेंस में उन्होंने आंदोलनकारियों की भाषा और कथित हिंसा पर सवाल उठाते हुए पूछा क्या जेन-जी का मतलब अधपके, अधकचरे, नल्ले और गालीबाज लोगों का झुंड है?
शुक्रवार, ३१ जुलाई को आयोजित प्रेस कॉन्प्रâेंस में एक घायल सब-इंस्पेक्टर की बेटी ने भावुक होकर दावा किया कि २५ जुलाई को जंतर-मंतर के मंच के पास भीड़ ने उसके पिता को खींचकर बेरहमी से पीटा। युवती के मुताबिक, उसके पिता की वर्दी खून से पूरी तरह लाल हो गई थी और उन्हें दोपहर करीब दो बजे आरएमएल अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां वे लगभग चार घंटे तक बेहोश रहे।
‘मैं भी जेन-जी हूं, मेरे पिता की जिंदगी की कीमत क्यों नहीं?’
घायल एक एसआई की बेटी ने कहा कि वह भी उसी पीढ़ी का हिस्सा है, जिसे जेन-जी कहा जा रहा है। उसने पूछा कि क्या केवल आंदोलन में शामिल युवाओं की भावनाएं और अधिकार मायने रखते हैं? क्या वर्दी पहनने वाले व्यक्ति की पत्नी, बच्चे और परिवार की कोई कीमत नहीं होती? क्या पुलिसकर्मी को पीटकर अधमरा कर देना लोकतांत्रिक विरोध कहा जा सकता है?
परिजनों ने संसद और केंद्र सरकार से मामले की निष्पक्ष जांच कराने तथा पुलिसकर्मियों पर हमला करने वालों की पहचान कर उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की। उनका कहना था कि वे छात्रों की वास्तविक मांगों के विरोधी नहीं हैं, लेकिन किसी भी आंदोलन की आड़ में हिंसा और जानलेवा हमले को सही नहीं ठहराया जा सकता। कांग्रेस ने भी प्रदर्शन स्थल के निकट कथित रूप से पत्थरों से भरे एक ट्रक की मौजूदगी पर सवाल उठाए हैं। आंदोलनकारियों का कहना है कि शांतिपूर्ण छात्रों को बदनाम करने और पुलिस कार्रवाई को जायज ठहराने के लिए हिंसा की पूरी कहानी की निष्पक्ष जांच जरूरी है।
पुलिस की चोट दिखी, छात्रों के जख्मों का क्या?
इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा पहलू भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। प्रदर्शनकारियों ने दिल्ली पुलिस पर लाठीचार्ज, आंसू गैस, पैलेट गन और अत्यधिक बल प्रयोग के आरोप लगाए थे। अनेक छात्र घायल हुए, कई को घसीटकर हिरासत में लिया गया और महिलाओं से दुर्व्यवहार के दावे भी सामने आए।
ऐसे में केवल पुलिसकर्मियों के परिवारों की प्रेस कॉन्प्रâेंस के आधार पर पूरी जेन-जी को हिंसक, निकम्मा या गालीबाज घोषित करना न तो उचित है और न ही निष्पक्ष। असली सवाल यह है कि हिंसा किसने शुरू की, पुलिसकर्मियों पर हमला करने वाले कौन थे और क्या शांतिपूर्ण छात्रों तथा उपद्रवी तत्वों की पहचान अलग-अलग की गई?
‘भाजपा के गुंडों ने किया था पुलिसकर्मियों पर हमला’
दूसरी ओर, सीजेपी संस्थापक अभिजीत दीपके ने घायल पुलिसकर्मियों और उनके परिवारों के प्रति सहानुभूति जताते हुए दावा किया कि हिंसा छात्र प्रदर्शनकारियों ने नहीं की। उनका आरोप है कि आंदोलन को बदनाम करने के लिए कथित भाजपा समर्थकों और बाहरी तत्वों को भीड़ में भेजा गया था। हालांकि इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
