मुख्यपृष्ठनए समाचारभिवंडी बनता जा रहा है इमारतों का कब्रिस्तान!

भिवंडी बनता जा रहा है इमारतों का कब्रिस्तान!

सामना संवाददाता / मुंबई

भिवंडी का बड़ा हिस्सा अनियोजित ढंग से विकसित हुआ है। पावरलूम उद्योग, मजदूर बस्तियों और सस्ते किराए की मांग के कारण संकरी गलियों में छोटे भूखंडों पर तेजी से बहुमंजिला निर्माण हुआ। कई इमारतें बिना पर्याप्त नींव, स्वीकृत नक्शे, गुणवत्ता परीक्षण, खुली जगह या अग्निसुरक्षा व्यवस्था के बनीं। समय के साथ नीचे गोदाम, पावरलूम या दुकान और ऊपर आवास बना दिए गए। इससे मूल डिजाइन से अधिक भार पड़ता गया।
पुरानी इमारतों में छत पर अतिरिक्त कमरे, पानी की टंकियां और मोबाइल टावर जोड़ना, नीचे की दुकानों के लिए दीवार या कॉलम काटना तथा इंजीनियर की निगरानी के बिना मरम्मत करना आम समस्या है। इमारत के ढांचे से ऐसी छेड़छाड़ का कोई रिकॉर्ड नहीं रहता। जब बारिश से कंक्रीट में पानी घुसता है, सरिया जंग खाता है और दीवारों में दरारें बढ़ती हैं, तब मामूली मरम्मत भी पूरे ढांचे का संतुलन बिगाड़ सकती है।
भिवंडी में २०१६ से २०२६ के बीच कई घातक इमारत हादसे हो चुके हैं। फिर भी प्रत्येक हादसे के बाद वही क्रम दोहराया जाता है। जांच समिति का गठन, मालिक या ठेकेदार पर मामला, मृतकों के परिवारों के लिए मुआवजा और मानसून से पहले नए नोटिस। पुरानी जांच रिपोर्टों की सिफारिशें लागू हुर्इं या नहीं, इसका कोई सार्वजनिक हिसाब नहीं दिया जाता।
लोग जर्जर इमारत खाली क्यों नहीं करते?
इस संकट का एक मानवीय पहलू भी है। किसी गरीब किरायेदार या छोटे मकान मालिक से केवल यह कहना कि सात दिन में घर खाली करो, समाधान नहीं है। वैकल्पिक आवास न मिलने, किराया वहन न कर पाने, रोजगार और बच्चों के स्कूल से दूरी तथा पुनर्विकास में अपना अधिकार खोने के डर से लोग खतरनाक इमारत छोड़ने को तैयार नहीं होते।
कई मामलों में मकान मालिक और किरायेदार के बीच विवाद रहता है। मालिक इमारत खाली कराकर भूखंड विकसित करना चाहता है, जबकि निवासी पुनर्वास की लिखित गारंटी मांगते हैं। दूसरी ओर, कुछ निवासी खुद भी खतरे को कम करके देखते हैं और इंजीनियरिंग रिपोर्ट के बजाय स्थानीय मिस्त्री की मरम्मत पर भरोसा करते हैं। सरकार ने न तो पर्याप्त ट्रांजिट शिविर बनाए, न किराया सहायता की स्थायी व्यवस्था और न पुनर्विकास विवादों के लिए त्वरित न्यायाधिकरण की व्यवस्था। यही कारण है कि ‘खाली करो’ का नोटिस वर्षों तक दीवार पर लटकता रहता है और लोग भीतर रहते रहते हैं।
सरकार की सबसे बड़ी कमजोरी, नीति है, अमल नहीं
महाराष्ट्र में ३० वर्ष से अधिक पुरानी इमारतों के संरचनात्मक ऑडिट का प्रावधान है। उम्र के आधार पर तीन या पांच वर्ष के अंतराल पर ऑडिट कराने की व्यवस्था भी बताई जाती है। लेकिन ऑडिट निजी सोसायटी या मालिक द्वारा नियुक्त इंजीनियर से कराया जाता है, जिससे रिपोर्ट की निष्पक्षता पर प्रश्न उठते हैं। राज्य सरकार ने २०२३ में नगर निकायों को खतरनाक इमारतों का तीसरे पक्ष से ऑडिट कराने का निर्देश दिया था, पर इसका सार्वभौमिक और पारदर्शी क्रियान्वयन दिखाई नहीं देता।
सरकार की दूसरी कमजोरी पुनर्वास नीति है। महानगरपालिकाओं को इमारत खाली कराने का अधिकार तो दिया गया है, लेकिन विस्थापित परिवारों के लिए पर्याप्त घर, किराया या ट्रांजिट वैंâप नहीं दिए गए। अधिकारी जानते हैं कि जबरन निष्कासन करने पर सैकड़ों परिवार सड़क पर आ जाएंगे, इसलिए कार्रवाई टाली जाती है।
प्रशासन की लापरवाही कहां-कहां?
कोहिनूर इमारत के मामले में प्रशासन को कम-से-कम इन सवालों का उत्तर देना होगा। इमारत को २०२० में खतरनाक घोषित किया गया तो छह वर्षों में कितनी बार निरीक्षण हुआ? निवासियों को केवल नोटिस दिया गया या पानी-बिजली काटकर निष्कासन की कार्रवाई भी की गई? इमारत में मरम्मत किस अनुमति से चल रही थी? क्या अधिकृत संरचनात्मक इंजीनियर ने काम की निगरानी की? मालिक और ठेकेदार पर पहले कार्रवाई क्यों नहीं हुई? वार्ड अधिकारी, अभियंता और अतिक्रमण विभाग ने स्थिति की रिपोर्ट आयुक्त को कब भेजी? केवल मालिक और ठेकेदार को गिरफ्तार कर लेने से प्रशासन की भूमिका समाप्त नहीं हो सकती। जिस सरकारी तंत्र को इमारत के खतरनाक होने की छह साल से जानकारी थी, उसकी निष्क्रियता की भी आपराधिक जवाबदेही तय होनी चाहिए।
मनपा ने किया था खतरनाक घोषित
कोहिनूर अपार्टमेंट का असेसमेंट २००७ में हुआ था और इसे २०१२ में बनाया गया था। इमारत में दो विंग थे। शुरू से ही घटिया निर्माण के कारण भिवंडी निजामपुर मनपा ने इसे ‘खतरनाक’ घोषित कर नोटिस जारी किया था। इमारत के एक विंग के ग्राउंड फ्लोर के कुछ पिलर क्षतिग्रस्त हो गए थे। गुरुवार शाम ६ बजे से उनकी मरम्मत शुरू हुई। इसी दौरान इमारत में दरारें दिखने लगीं और रात ८ बजे तक यह एक तरफ झुक गई। सहायक आयुक्त अरविंद घोगरे टीम के साथ मौके पर पहुंचे और इमारत खाली कराने की प्रक्रिया शुरू की। इसी बीच कुछ लोग सामान लेने अंदर गए और अचानक पूरी इमारत गिर गई। हादसे के बाद चीख-पुकार मच गई। भिवंडी फायर ब्रिगेड, पुलिस और आपातकालीन सेवाओं की टीम तुरंत पहुंची। स्थानीय युवाओं ने भी बचाव में मदद की और मलबे से २ लोगों को जिंदा निकाला। अधिकारियों के अनुसार, ग्राउंड फ्लोर पर सबसे ज्यादा लोग फंसे थे। घायलों का इलाज भिवंडी सिविल अस्पताल में चल रहा है।

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