एड. राजीव मिश्र मुंबई
एक हफ्ता से गजोधर घर से बाहर नहीं निकरे। कचहरी जात रहें तो घर मा दलाली-मुर्दाली से दुइ पइसा आवत रहा पर जउने दिन से देश के मुखिया कुछ कहिन है, उही दिन से गजोधर के साथ उनकी जिनगी के तालमेल गड़बड़ाई गवा है। गजोधर बौ गजोधर के दशा देखिके घनघोर चिंता में डूबि गईं हैं। समझि में नही आवत है कि गजोधर के का इलाज किहा जाय। दस दिन बाद जब गजोधर अपने कमरा से बाहर निकरे तो गजोधर बौ गजोधर के देखतै खुशी से झूमि गयी अउर पूछि बइठीं, का हो बिकास के बाबू! दस दिन तक कहां घर में ओलिआन रहौ? ई अंतरराष्ट्रीय समिस्सा अहइ, तुम्हरी समझ में नही आई। हम ‘वर्क प्रâॉम होम’ करत रहे। ‘वर्क प्रâॉम होम’ ई का होत है? ई घर से काम करे के तरीका है। अच्छा! तब तो दस दिन में मजे के पइसा कमाइ लिहे होइहौ! तुम एक नंबर के बकलोल हौ, इहां देश के ऊपर इतना बड़ा आर्थिक संकट आवा है अउर तुमका पइसा के परी अहइ। संकट! कउन संकट? हमका तो सब कुछ ठीक लागत है। अबही बिहनइ अबिनसवा दुइ ठो तरमीन कराय के दुइ हजार कमाइ के आवा है ओहिके लिए तो कउनउ संकट नही है तो तुम्हरे लिए कउन संकट के सहारनपुर होइ गवा है? अरे बिकास के माई! अबिनसवा सरकार के बिपच्छ के मनई है इतना कहिके गजोधर फिरि से अपने कमरा में घुसि के दरवाजा बंद कइ लिहे। थोड़ी देर बाद घर के बिजली चली गई अउर गजोधर के चाय के तलब लगी तो पसीना-पसीना होइ के कमरा से बाहेर आएं तो देखत हैं सबके घर मा बिजली है बस गजोधर के घर मा बिजली नही है तो अपने मेहरिया से पूछे, बिकास के माई जरा एक कप चाय बनाओ अउर ई अपने घर के बिजली काहे चली गई? अइसा है बिकास के बाबू! अखबार तुमही नही हमहुं पढ़ी थऽ… देश के मुखिया ऊर्जा बचत के लिए भी कहे हैं यहि कारन अब घर में न तो बिजली जली अउर न तो गैस। ई आर्थिक संकट के मूल में ऊर्जा संकट है। तो अब एक काम करो पहिले टंगारी लइके लकड़ी के बोटा चीरो तब चाय पइहौ, नही तो जाओ अपने कमरा में बइठ के आर्थिक संकट पर चिंतन करो।
