मुख्यपृष्ठस्तंभअवधी व्यंग्य : फुलगेनवा

अवधी व्यंग्य : फुलगेनवा

एड. राजीव मिश्र, मुंबई

आज दुपहरी से फुलगेनवा अपने सास के ताक-झांक में लागि रही कि उ अपने अदमी के साथ का बात कइ रहीं हैं। दुपहरी से यहि कारन कि फुलगेनवा १० बजे के पहिले उठी नही पावत है। कई बार तो मनोरथ उठि जात हैं, पर उनकर मेहरारू फुलगेनवा सोई रहत है। कई बार मनोरथ के बाप-महतारी मनोरथ से बात किहिन पर मनोरथ मानो मेहरारू के गोड़े में लोटि गय होय। पलटि के अपने महतारी के जबाब दिहिन, अब का करी माई! उ नही उठि पावत है तो ओहिके परान लेइ लेई का? मनोरथ के माई के पास यहि बात के कउनउ जबाबय नही रहा सो चुप होइ गर्इं। लेकिन फुलगेनवा के सूति के उठय के टाइम में कउनउ बदलाव नही भवा। इहाँ तक कि मनोरथ के बाबू भी मनोरथ से यहि समस्या पर बात करे के कोशिश किहे पर मनोरथ के कान वे जूँ तक नही रेंगत है। धीरे-धीरे फुलगेनवा घर के मलकिन होइ गई और मनोरथ की माई घर के कूड़ा-कचरा होइ गर्इं। फुलगेनवा के जब मन होय दुइ ठो लुगरी उठाइ के नइहर निकरि जात है। अब घर, घर नही धरमशाला होइ ग्या है। मनोरथ के बाप नात-हित सबसे ई समस्या पे राय लिहें पर सब एक्कय बात कहें। अइसा करो एक बार अपने लड़िका से बात करो का पता कुछ सुधार होय जाय। पर मनोरथ के न तो सुधरे के रहा न उ सुधरी। मेहरारू के आगे मनोरथ भीगी बिल्ली बनि जात रहें अउर माई बाप के आगे शेर। अगर महतारी एक बात बोलइ तो मनोरथ दस बात बोलइ। एक दिन कुछ जियादा होइ ग तो मनोरथ अपने माई से कहें अइसा है हमार मेहरारू खाना बनावै वाली नही है, हम महीना के एक लाख रुपिया कमाई थऽ चाही तो ऐश करी ऐश। इतना सुनतइ मनोरथ के माई के दिमाग भन्नाइ गवा अउर संझा के मनोरथ के बाबू के आये के बाद उनके अइसन रिचार्ज किहिन कि, मनोरथ के बाबू लाठी लइके मनोरथ के ऊपर पिलि पड़े। लेइ लाठी लइ लाठी मारत-मारत मनोरथ के बेदम कइ दिहें। तब से लइके आज तक फुलगेनवा के साथ मनोरथ रिश्तेदारी-रिश्तेदारी घूमि रहें हैं, पर ओहि दिन के बाद से मनोरथ अपने घर में नहीं जाइ पाए।

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