एड. राजीव मिश्र मुंबई
आज तीन दिन से लगातार लाइनमैन के हड़कावे के बाद संदीप अपने बिजली के बिल के भरय खातिर बिजलीघर पहुँचे। अब दुइ बरिस होइ गवा रहा और यहि दुइ बरिस में संदीप के एकउ महीना के बिल नही मिला है। जब-जब लाइनमैन से पूछिन तब-तब एक्कय जबाब मिला, जब भरे जइहौ तो बिलौ मालूम होइ जाई। यहि चक्कर मा लगभग दुइ बरिस बीति गवा। जब लाइनमैन बिजली काटय पर उतारू भवा तब संदीप कइसउ बिजलीघर पहुँचें। बिजलीघर पहुँचि के एक बाबू से जाइ के पूछे, भइया बिजली के बिल कहाँ भराई? कहाँ से आए हो? लखौवा से, काहें? जवन पूछा जाए उतनय बोलव, समझे! अबहीं यहि मेज पे जवन साहेब अइहैं उनसे पूछो, उ बतईहैं। आधा घंटा बाद उ साहेब मुँह में पान दबाय के आये। उनके अउतय संदीप उनके मेज पे पहुँचे। साहेब साहेब ओ साहेब, का है? काहे चिल्लाय रहे हो? चिल्लाय नही रहे हम तो बस पूछ रहे हैं। का पूछ रहे हो? ई पूछ रहे हैं कि बिजली के बिल कहाँ भरा जाई? ई इंक्वायरी काउंटर है का? जवन पुछि रहे हो? जाओ उ मेज पे जवन साहेब बइठे हैं उनसे पूछो। कउने साहेब से? अरे यार उ चार नंबर काउंटर पे जवन चश्मा लगाय के बैठा हैं उनही से पूछौ। अरे उहै तो तुम्हरे पास भेजिन है। उ हैं बकलोल अच्छा तुम एक काम करो, उ जवन नौ नंबर पे मैडम बैठी हैं न उनसे पूछो। संदीप जब नौ नंबर पे पहुँचे तो उ मैडम बैठि के स्वेटर बीनि रही। मैडम बिल कहाँ भराई? काहे के बिल? अब बिजलीघर में बिजलिये के बिल भराई न! हाँ तो जाओ काउंटर पर। पर कउने काउंटर पर? उ हमें नही पता, पर कुछ पत्रपुष्प होय तो शायद पता चलि जाय। ई पत्रपुष्प का होत है? अरे पूरा बकलोलय हौ का? बिल भरे बिना का देइहौ? रुपिया। उहै तो पत्रपुष्प है भैया। कुछ लता पात्र एहरौ दो तो पता चली। एक काम करो सौ रुपया निकारो तो बताई। संदीप जेब से जब सौ रुपिया निकारि के मैडम के दिहिन तो उ बोलीं, उ नयकी बिल्डिंग मा ७ नंबर खिड़की पे जवाहिर बाबू हैं उनही के पास जमा कइ दो। थोड़ी देर बाद संदीप फिर से हॉफत आये और मैडम से बोले, मैडम मैडम… हाँ बोलव, उ जवाहिर बाबू तो छुट्टी पर हैं। तो हम का करी? मैडम अब पत्रपुष्प लिहिन तो बिलवा तो भराय देव। अइसा है हम पत्रपुष्प पता बतावै के लिहा रहा अगर बिल जमा करवावे के होय तो अलग से देवय के परी, इतना कहते ऊन मा सलाई घुमावत दूसरे काउंटर पे गप्पा मारय चली गई अउर संदीप आपन जेब पकड़ि के उहीं खड़ा के खड़ा रहि गएँ।
