एड. राजीव मिश्र, मुंबई
प्रकाश गुरु साठ दिन पहिलय से दीवाली पे बैंगलोर जाए के खिड़की वाली सीट के टिकस निकारि के पूरे जोश के साथ आज टेशन पहुंचे हैं। दिवाली के त्यौहार के चलते टेशन पे खचाखच प्रकाश गुरु के पहुंचय के पहिले ट्रेन पलेटफारम पर आइ चुकी रही। प्रकाश गुरु मनय-मन खुश होत के अंदर आपन सीट हेरय लगे। डब्बा के घुसे तो एक-एक सीट पर दुइ-दुइ मनई लदा रहें। प्रकाश गुरु जब सीट नंबर २२ पे पहुंचे तो चकराय गए। उनके समझय में नही आवा कि उ अपनय डब्बा में घुसा हैं कि कउनउ दुसरे डिब्बा में घुसि गए हैं। काहें कि २२ नंबर पे पहिलय से दुइ जने बइठा अउर एक जन लटका रहेन। प्रकाश गुरु एक यात्री से पूछिन, भइया उद्यान एक्सप्रेस इहै गाड़ी अहइ न… हां इहै उद्यान एक्सप्रेस है। प्रकाश गुरु फिरि से आपन टिकस निकारे अउर सीट नंबर देखें तो सीट नंबर बरोबरै रहा। प्रकाश गुरु खूब सोच-विचार के अपनी सीट पे बइठे लोगन से कहिन- ‘भइया ई हमरी सीट है।’ …हां तो हम लोग कब कहिन कि ई हम लोगन के सीट है? तो भइया उठा जाय। हमहूं के बइठइ के है। तो बइठो, हम कहां मना किये हैं?… अरे जब उठियो तब न बइठब। कइसौ-कइसौ प्रकाश गुरु के सीट खाली भई। आधउ घंटा न बइठे होइहैं, तब तक एक ६० बरिस के दादी अम्मा आइके प्रकाश से बोलीं, भैया हमार तबीयत ठीक नही है। तुम हमरी सीट लेइ लइहौ का, थोड़ी देर हवा लगी तो रचि के तबीयत नीक होइ जाई। प्रकाश गुरु कसर-मसर करत रहें तब तक जवन मनई उनकर सीट पे बइठा रहा उ बोलि परा….गजब जमाना आइ गवा है, अदमी बूढ़ पुरनिया तक के इज्जति नही करत है। अरे उठि रहें हैं न तुम काहें चौधरी बनि रहे हौ? जब तक प्रकाश गुरु अपनी सीट से उठिके बुढ़िया माई के सीट पे पहुंचे तब तक उ सीट पर बुढ़िया माई के तीन पोता कलइया मारत रहें। प्रकाश भइया जइसइ बइठय के कोशिश किये एक लड़िका सीट पर सूतिके बोलिस, अंकल तुम कतहुं अउर बइठ जाओ हम लोगन के सोवय के अहइ। प्रकाश गुरु जब अपने सीट पे पहुंचे तो उहां बुढ़िया माई के नाक बोलत रहे।
