राजन पारकर
टीवी पर बाघा की अदा देखकर करोड़ों लोग मुस्कुराते हैं। मगर वैâमरे के पीछे वही कलाकार सीधा खड़ा भी नहीं हो पा रहा। मनोरंजन उद्योग का यही सबसे बड़ा विरोधाभास है। पर्दे पर मुस्कान बिकती है, मगर कलाकार की पीड़ा का कोई बाजार नहीं। सूत्रों के अनुसार, मनोरंजन जगत में लंबे समय से कलाकारों के स्वास्थ्य कार्य-अवधि और शारीरिक सुरक्षा को लेकर गंभीर चर्चा चल रही है। इंडस्ट्री में कानाफूसी है कि लोकप्रिय किरदार निभाने वाले कई कलाकार वर्षों तक शारीरिक कष्ट झेलते हैं लेकिन अनुबंध और करियर के दबाव में आवाज नहीं उठा पाते। जब तक टीआरपी आती है, तब तक कलाकार ‘मशीन’ माना जाता है। बीमारी शुरू होते ही वही कलाकार ‘रिप्लेसेबल’ हो जाता है। जो व्यवस्था कलाकार से हंसी खरीदती है, क्या उसे उसका स्वास्थ्य लौटाने की भी जिम्मेदारी नहीं लेनी चाहिए?
मुखौटे, मर्ज और महिमा असली तस्वीर कौन छिपा रहा है?
देश में कोरोना की आहट फिर सुनाई दे रही है, लेकिन सरकारी तंत्र आश्वासन के पोस्टर चिपकाने में व्यस्त है। मनोरंजन जगत में दर्शकों को हंसाने वाला कलाकार अपने शरीर की कीमत चुका रहा है, जबकि सत्ता के गलियारों में ‘संवेदनशील मुख्यमंत्री’ की छवि गढ़ने की होड़ लगी है। तीनों घटनाएं अलग-अलग हैं, मगर एक सवाल समान है- क्या व्यवस्था सच स्वीकार करने का साहस रखती है या केवल छवि बचाने का खेल चल रहा है? कोरोना लौट आया… मगर फाइलों में सब ‘कंट्रोल’ है चार मरीज मिले दो मौतें हुर्इं और सरकारी बयान वही पुराना- ‘घबराने की जरूरत नहीं।’ देश ने कोरोना के समय सबसे ज्यादा क्या देखा था? वायरस कम और सरकारी प्रेस कॉन्प्रâेंस ज्यादा। आज फिर वही दृश्य दोहराए जाने की आशंका जताई जा रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि तब आंकड़े छिपाने की चर्चा थी, अब खबरों को छोटा करके दिखाने की। सूत्रों के अनुसार स्वास्थ्य महकमे में इस बात को लेकर चर्चा है कि कहीं शुरुआती मामलों को ‘स्थानीय घटना’ बताकर गंभीरता कम करने की कोशिश तो नहीं होगी। राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि अगर संक्रमण बढ़ा तो सबसे पहले जिम्मेदारी तय करने के बजाय बयानबाजी शुरू होगी। जनता पूछ रही है-जीनोम सीक्वेंसिंग की रिपोर्ट आने से पहले इतनी बेफिक्री क्यों? और अगर सब नियंत्रण में है तो मौतें वैâसे हुर्इं? इतिहास गवाह है वायरस कभी झूठ नहीं बोलता… लेकिन आंकड़े अक्सर बोलने नहीं दिए जाते।
अस्पताल में औचक दौरा या राजनीति का नया मंच?
मुख्यमंत्री अस्पताल पहुंचे बच्चों को गोद में उठाया भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस का संदेश दिया। तस्वीरें वायरल हुर्इं तालियां भी बजीं। लेकिन जनता पूछ रही है-अगर अस्पतालों में भ्रष्टाचार पहले से था तो जिम्मेदार कौन? और अगर मुख्यमंत्री के दौरे के बाद ही अधिकारियों की नींद खुली तो अब तक वे किसकी सेवा कर रहे थे? राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि ऐसे औचक दौरों के बाद कई अधिकारियों की कुर्सियां हिल सकती हैं। सूत्रों के अनुसार स्वास्थ्य विभाग के भीतर जवाबदेही तय करने को लेकर हलचल तेज है और कुछ जिलों में प्रशासनिक फेरबदल की चर्चा भी है। फोटो खिंचवाना आसान है, व्यवस्था बदलना कठिन। जनता अब भाषण नहीं अस्पतालों में दवा डॉक्टर और ईमानदारी चाहती है। राजनीति हो प्रशासन हो या मनोरंजन-आज हर जगह एक ही बीमारी तेजी से पैâल रही है… ‘छवि बचाओ सच्चाई छिपाओ।’ वायरस का इलाज विज्ञान के पास है लेकिन व्यवस्था के इस संक्रमण का टीका अभी तक किसी प्रयोगशाला ने नहीं बनाया।
