सुरेश गोलानी / मुंबई
एक तरफ जहां सरकार खुले में शौच से मुक्ति, घर-घर और स्वच्छ सार्वजनिक शौचालयों के बड़े-बड़े दावे और उसके विज्ञापनों पर करोड़ों रुपए खर्च कर रही है, लेकिन जमीनी हकीकत तो कुछ और ही बयां कर रही है। भायंदर- पश्चिम स्थित झुग्गी बस्तियों में रहने वाले हजारों परिवार-खासकर महिलाओं के लिए सार्वजनिक शौचालय सिर्फ शोपीस बनकर रह गए हैं। सामाजिक कार्यकर्ता कृष्णा गुप्ता द्वारा राज्य मानवाधिकार आयोग को अप्रैल २०२५ में भायंदर के प्रभाग क्र.-१ में स्थित गणेश देवल, नेहरू नगर, गांधी नगर और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर नगर के सार्वजनिक शौचालयों की दयनीय स्थिति के बारे में अवगत कराया था। शिकायत को संज्ञान में लेते हुए आयोग ने मामला दर्ज कर लिया और मीरा भायंदर मनपा प्रशासन से संबंधित सार्वजनिक शौचालयों की स्थिति के बारे में विस्तृत रिपोर्ट पेश करने के आदेश दिए। अगली सुनवाई आयोग की सदस्य श्रीमती न्यायमूर्ति स्वप्ना जोशी के समक्ष २८ अक्टूबर को निर्धारित की गई है।
फटी बोरियां बनीं दरवाजे
बता दें कि इन सार्वजनिक शौचालयों में दरवाजे गायब होने के कारण लोग फटे हुए बोरों का इस्तेमाल पर्दे के रूप में करने को मजबूर हैं। सबसे बुरी तरह प्रभावित वे महिलाएं हैं, जो उन शौचालय में शौच करने के लिए मजबूर हैं, जिसमें दरवाजे नहीं हैं। इसके अलावा कई शौचालयों में नल नदारद हैं, घटिया निर्माण कार्य के कारण छतें कमजोर स्थिति में हैं, पानी की किल्लत और रखरखाव के अभाव में गंदगी और मच्छरों का साम्राज्य है, जिससे इलाके में बीमारियां पैâलने का खतरा बना हुआ है।
मनपा कर रही है अनदेखी
संबंधित ठेकेदारों और दोषी मनपा अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही की मांग करते हुए कृष्णा गुप्ता ने कहा, ‘शिकायत करने पर भी मनपा प्रशासन इन गंभीर समस्याओं को अनदेखा कर उन्हें सुलझाने में कोई रुचि नहीं दिखा रही है। इसी से लोगों में बुनियादी सुविधाओं की समस्याओं के प्रति मनपा की असंवेदनशीलता साफ नजर आती है।’ आरोप है कि मनपा शौचालयों के रखरखाव के लिए प्रति वर्ष करोड़ों रुपए खर्च तो करती है, पर स्वच्छता निरीक्षकों की ठेकेदारों के साथ कथित मिलीभगत के कारण वे खुलेआम हो रही इन अनियमितताओं को अनदेखा कर उन पर कोई कार्यवाही नहीं करते।
