मुख्यपृष्ठस्तंभभोजपुरिया व्यंग्य : कुर्सी के लड़ाई अउरी भीड़ के गिनती

भोजपुरिया व्यंग्य : कुर्सी के लड़ाई अउरी भीड़ के गिनती

-प्रभुनाथ शुक्ल भदोही
चुनावी मौसम आ गइल बा। अब राजनीति में विकास, रोजगार, शिक्षा, महंगाई, किसान आ बेरोजगारी के चर्चा कम हो रहल बा, बाकि भीड़ के चर्चा खूब हो रहल बा। केकर रैली में कतना भीड़ जुटल, केकरा सभा में कतना कुर्सी भराइल, केकरा मंच के सामने कतना आदमी लउकल आ केकरा सभा में कुर्सी खाली रह गइल। सत्ता पक्ष अपना भीड़ के ताकत बता रहल बा त विपक्ष खाली कुर्सियन के तस्वीर देखाके सत्ता पर तंज कस रहल बा।
मगर सवाल ई बा कि आखिर ई लड़ाई ह काहे के? भीड़ के कि जनता के? कुर्सी भरल बा कि खाली बा, एहसे जनता के जिनगी में का बदल जाई?
आज राजनीति के नया नारा बन गइल बा- तोहार भीड़, हमार भीड़, ओकर भीड़! सत्ता कहता हमार सभा में जनसैलाब उमड़ल बा, विपक्ष कहता तोहार कुर्सी खाली बा। सत्ता अपना भीड़ गिन रहल बा त विपक्ष ओकर खाली कुर्सी। बाकि केहू ई ना गिन रहल बा कि कतना बेरोजगार नौजवान के हाथ में रोजगार बा, कतना किसान के फसल के सही दाम मिलल, कतना गरीब के घर में चूल्हा ठीक से जरता, कतना स्कूल में पढ़ाई आ अस्पताल में इलाज के व्यवस्था सुधरल।
हकीकत त ई बा कि सत्ता होखे चाहे विपक्ष, दुनो के नजर कुर्सी पर टिकल बा। एक के कुर्सी बचावे के चिंता बा त दूसरा के कुर्सी पावे के बेचैनी। एह लड़ाई में जनता कहीं पीछे छूट गइल बिया। जनता के जरूरत, परेशानी आ उम्मीद अब चुनावी भाषण के सजावट बनके रह गइल बा।
रैली में आवे वाला हर आदमी के संख्या त गिन लिहल जाता, बाकि ओकर दुख-दर्द के हिसाब के रखी? जे धूप में घंटों खड़ा बा, जे नारा लगा रहल बा, जे झंडा उठा रहल बा, का ओकरा सवाल के जवाबो मिल रहल बा?
लोकतंत्र में भीड़ जुटावल कामयाबी के पैमाना ना होखे के चाहीं। असली कामयाबी त तब होई जब जनता के सवाल पर बात होई, जब नेता भीड़ के चेहरा के पीछे छिपल हर आदमी के समस्या समझी।
याद रखीं, जनता खाली भीड़ ना ह, ऊ लोकतंत्र के असली मालिक ह। कुर्सी आज एहिजा बा, काल्हु दोसरका लगे हो सकेला, बाकिर जनता के सवाल हमेशा जिंदा रही। एह चुनावी मौसम में बस एतने सवाल बा- नेता जी! तोहार भीड़ कतना बा, ई त बता देत बाड़ऽ, बाकि जनता के समस्या कतना कम कइलऽ, एकर हिसाब कब देबऽ? काहे कि लड़ाई कुर्सी के हो सकेला, बाकि लोकतंत्र जनता खातिर होखे के चाहीं।

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