प्रभुनाथ शुक्ल, भदोही
गाँव-जवार में चुनाव आवे के आहट सबसे पहिले मौसम से ना, बधाई संदेश के होर्डिंग अउरी बैनर से मिलेला। चुनाव लड़ई वाले लोग मुस्कराई के मिलेला। दूसर बात जइसे ही इलाका में कवनो आदमी अनायास दाँत निपोरत अउरी झुक के पैलगी करई लागेला, समझ लऽ कि ऊ भावी प्रत्याशी के रोग से पीड़ित हो गइल बा। एकरा सबसे बड़का प्रमान ई होखे कि अगर ऊ सोशलमीडिया पर दबदबा वाला रील डाले लागल त गुरु ऊ पंचायत चुनाव के माहौल बनावत बा।
काल्ह तक जे बंदा केहू के राम–राम तक ना करत रहे, अचानक विनम्रता के सागर बन जाला। रास्ता में मिले त गोड़ छूवे लागेला, काका, का हाल बा? पूछ-पूछ के परेशान कर देला। लोग सोचे लागेला ई केतना सज्जन आदमी बा! बाकि असल बात ई ह कि सज्जनता ना, चुनावी मजबूरी बोल रहल बा।
पहिले ऊ मंदिर में साल में दू बेर जाला दशहरा अउरी छठ पर। अब रोजे माथा टेकत नजर आवेला। गीता, रामायण, सुंदरकांड के पाठ करवावे लागेला। लाउडस्पीकर पर कीर्तन बजवावेला। गाँव के लोग कहेला, ‘अरे, ई त संत बन गइल।’ जबकि संत ना, टिकट के जुगाड़ चल रहल होला।
सामाजिकता के भी अजीबे खेल बा। पहिले जे आदमी चंदा माँगे पर दरवाजा बंद कर देत रहे, अब खुदे चंदा देवे, समिति में घुसे, भाषण झाड़े लागेला। स्कूल, अस्पताल, मेला, क्रिकेट के खेलकूद हर जगह मुख्य अतिथि ऊहे! फोटो खिंचावे के एतना शौक कि मोबाइल वाला भी तंग। सबसे खतरनाक बदलाव भोज में दिखेला। अब ऊहे आदमी पूरा गाँव के भोज देवे लागेला। कहीं सत्यनारायण कथा त कहीं होली मिलन, कहीं कंबल वितरण त कहीं लिट्टी-चोखा अउरी जन्मदिन के पार्टी। जे भी खाला, ऊहे कहेला, भईया, अगिला प्रधान त इहे होई। बीमारी में हालचाल पूछे के नया-नया बुखार भी चढ़ जाला। काल्ह तक जे मरीज के देखे ना जात रहे, अब हर बेड पर फल अउर बिस्कुट लेके हाजिर। असल चिंता मरीज के ना, वोटर के बा। मरीज भी मन ही मन मुस्कुराके समझ जाला कि दवाई से पहिले समर्थन के जरूरत बा।
गाँव के जनता अब बहुत चालाक हो गइल बिया। ऊ लोग के अनुभव से पता बा कि ई सब लक्षण साधारण ना होखेला। जे आदमी अचानक जरूरत से ज्यादा धार्मिक, विनम्र अउरी दयालु बने लागे, समझ लऽ कि बंदा चुनाव लड़े के पूरा मन बना चुकल बा। अउर सच पूछीं त, गाँव में ई बदलाव देखके लोग मजा भी लेला। कहेला चलऽ, पाँच साल में एके बेर सही, नेता जी के कृपा त बरस रहल बा। काहे कि चुनाव आवेला त नेता संत बन जाला, अउरी चुनाव गइल त फेर ऊहे पुरा शहंशाह।
