मुख्यपृष्ठस्तंभभोजपुरिया व्यंग्य: सावन त गांव आइल, कजरी-झूला भुलाइल

भोजपुरिया व्यंग्य: सावन त गांव आइल, कजरी-झूला भुलाइल

प्रभुनाथ शुक्ल / भदोही

सावन के महीना आवते गांव-गांव के माहौल बदल जाला। बदरी घिरत बा, पुरवइया बहत बा, धरती हरियर हो जाला आ आंगन में हंसी के फुहार बरसे लागेला। पहिले संझा होते कहीं ना कहीं से कजरी के मीठ आवाज सुनाई देत रहे सावन में लागल बदरिया…। बाकि अब ऊ दिन बीतल जमाना के कहानी जइसन लागेला।
सावन आजो आवत बा, बादर आजो घिरत बा, हरियरिमा आजो धरती के गोद भरत बा, बाकिर पेड़ उदास बाड़ें, डाल सूनी बा आ झूला के रस्सी के इंतजार बा। पूर्वांचल के गांव में झूला के पटोहा कहके पुकारल जाला, बाकि अब ऊ बहुत कम जगह दिखाई देला।
मिर्जापुर, भदोही, वाराणसी, प्रयागराज, जौनपुर आ आसपास के इलाका में कजरी खाली एगो गीत ना रहल, बल्कि पूर्वांचल के लोकजीवन के धड़कन रहल। सावन में औरतन के टोली जुटत रहे। माई, बहिन, बेटी आ सखी-सहेली पेड़ के डाल पर पड़ल झूला पर झूलत रहलीं आ साथे कजरी के मीठ तान उठत रहे।
कजरी में प्रेम रहे, विरह रहे, मिलन के आस रहे, पिया के इंतजार रहे आ मायके के याद के टीस भी। शब्द साधारण रहत रहे, बाकि एहसास बहुत गहिर। कजरी में एगो अइसन प्यास आ मिठास रहत रहे, जे सुनते मन भींज जात रहे।
कहीं कजरी गीत के मुकाबला होत रहे, कहीं लोकगायन के महफिल सजत रहे, त कहीं कजरी के साथ कुश्ती-दंगल गांव के उत्सव बन जात रहे। मनोरंजन के साधन कम रहलें, बाकिर अपनापन भरपूर रहे। पूरा गांव एक-दूसरा के सुख-दुख में शामिल होत रहे।
बाकि अब समय बदल गइल बा। मोबाइल आ इंटरनेट के दौर में कजरी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर खूब सुनाई देत बा। सोशल मीडिया पर कजरी के वीडियो वायरल होत बा, मंचन पर कलाकार गावत बाड़ें। बाकिर सवाल ई बा कि जे कजरी गांव के चौपाल, आंगन आ पेड़ के डाल से निकलत रहे, ऊ अब गांव में कहां बा?
नई पीढ़ी के बहुत बेटियन के ऊ पुरान कजरी गीत मालूम नइखे, जे दादी-नानी आ माई लोग सावन में गावत रहलीं। जीवनशैली बदल गइल, गांव बदल गइल, पेड़ घट गइलें आ धीरे-धीरे लोकपरंपरा के रंग फीका पड़त गइल।
सावन आजो हरियर बा, बाकिर सावन के मन उदास बा। बादर बरसत बा, बाकिर डाल पर झूला नइखे। मोबाइल में कजरी गूंजत बा, बाकिर गांव के चौपाल पर ओकर तान नइखे।
!!समाप्त!!

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