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बाहरियों के सहारे भाजपाइयों की बची लाज

-आयातित और हिंदीभाषियों के ७० तो परिवारवाद से १४ प्रत्याशियों को मिली जीत

-शिवसेना उपनेता सुषमा अंधारे ने बोला हमला

सामना संवाददाता / मुंबई

मनपा चुनाव में भले ही भाजपा महायुति को बहुमत मिला हो, लेकिन सच्चाई यह है कि यह जीत आत्मनिर्भर नहीं, बल्कि उधार की बैसाखियों पर टिकी हुई है। पार्टी टूटने के बाद नगरसेवकों के पाला बदलने और बड़े पैमाने पर पदाधिकारियों की सेंधमारी के बावजूद ठाकरे बंधुओं ने भाजपा-शिंदे गुट को जबरदस्त चुनौती दी। महाराष्ट्र और मुंबई की अस्मिता के मुद्दे पर शिवसेना की हुंकार ने मुंबई की राजनीति को झकझोर कर रख दिया।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, भाजपा की तथाकथित जीत में ३५ नगरसेवक बाहर से आए हुए हैं, ३७ हिंदीभाषी व गैर मराठी हैं और जो बचे हैं, उनमें से कई विधायक-सांसदों के बेटे-बेटियां या रिश्तेदार हैं यानी भाजपा के पास मुंबई में अपना जनाधार नहीं, बल्कि सत्ता के लिए परिवारवाद और बाहरी सहारे हैं। जानकारों के अनुसार, अगर देवेंद्र फडणवीस सच में चाणक्य होते, तो अब तक मुंबई में मेयर बनाने में सफल हो चुके होते, लेकिन यहां वे ऐसा नहीं कर पा रहे क्योंकि वे फंस गए हैं।
मनपा चुनाव में शिवसेना गठबंधन के पास ७१ सीटें हैं, कांग्रेस ने २४ सीटें जीतकर मजबूती दिखाई, जबकि भाजपा महायुति ११८ सीटों पर सिमट गई। यह कोई प्रचंड बहुमत नहीं, बल्कि अधर का बहुमत है, जो किसी भी झटके में गिर सकता है।
इसी बीच शिवसेना की उपनेता सुषमा अंधारे ने भाजपा की असलियत उजागर करते हुए तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि तमाम साम-दम-दंड-भेद के बाद भी भाजपा मुंबई में अपने दम पर शतक तक नहीं लगा पाई है। यह भाजपा के लिए अश्वत्थामा का न भरनेवाला जख्म है।

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