राजेश विक्रांत
हरजिंदर सिंह सेठी मुंबई के प्रगतिशील चेतना के वरिष्ठ लेखक, संपादक व कवि हैं। उनका काव्य संग्रह “मेरी धरती के लोग” न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुआ है। ‘आत्मकथ्य’ में कवि ने लिखा है कि, “कविता मेरे लिए जीवन को बेहतर बनाने की सतत सृजन प्रक्रिया है।सामाजिक सरोकारों और जीवन की गहन समस्याओं का चित्रण कर उनका हल खोजने का उपक्रम है। उसका उद्देश्य मनुष्य को सही दिशा देकर समाज की बेहतरी का कारक बनना है। मानव मूल्यों का क्षरण, चारों ओर फैली अराजकता, संवेदनाओं का समाप्त होना, बिगड़ता पर्यावरण, हरी भरी वादियों का खत्म होते जाना, हाशिये पर धकेल दिये गये छोटे लोगों की चिंता से ग्रसित हैं मेरी कविताएं। अपने समय और आस पास के माहौल को देखने समझने, मनुष्य की चेतना को जागृत करने, मानव मन की पीड़ा की गहन अनुभूति को व्यक्त करने के साथ जीवन में दारिद्रय का अंत और मानवीय गौरव को बहाल रखने, सामाजिक बराबरी के लिए लड़ने और सामासिक संस्कृति को नष्ट होने से बचाने का प्रयास करने के साथ प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरण की रक्षा करने, चिड़ियों की चहचहाहट, बच्चों की भोली मुस्कान, औरतों का धीरज, मनुष्य जीवन को बचाये रखने और दुनिया को खूबसूरत बनाने के लिए आदमी की आंखों में बसे सपनों को सहेजने का काम कर सकें, यही मेरी कविताओं की कोशिश और लक्ष्य है।”
“मेरी धरती के लोग में कुल 59 कविताएं हैं, जिनके शीर्षक यूं हैं- सूरज उगने तक, मैंने लिखी कविताएं, जो जरूरी है, हाशिये पर खड़ा मैं, धरती का कोना, स्मृति, नहीं देखा उन्होंने, ढाबे में पहाड़, क्रूर समय में, मैंने नहीं लिखी कविता, कहां- कहां होती है कविता, गायब होते शब्द, बसंत, ख्वाहिश, एक दिन, वह नहीं जानता, मेरा भी है यह शहर, शब्दजाल में फंसी कविता, मुकद्दर, शब्द, मुझे माफ करना, तुम्हारे लिए, एल्बम, गांव, स्मार्ट सिटी, घोड़े, बहुत कुछ है तुम्हारे पास, कविता आजकल, विकास, मैं वापस आऊंगा, अलविदा, किताब, बच्चे, बेशुमार बच्चे, पहाड़ का कवि, आलोचक, सम्भावना, पिता ने कहा, जिंदगी में दखल, मेरी कविताएं, चुप नहीं हैं हम, सवाल तो उठेंगे,
नर्स, निर्णय, कवि होने का नियम, नींद से लम्बी रातें, चिट्ठियां, मित्र गाथा,
गांव के लोग, कब तक, तलवार पांच हजारी, तुम देखना मेरे दोस्त, जरूरी नहीं, सौंदर्यानुभूति, नया अध्याय, हत्यारा, अधूरी कविता, धरती का भगवान, एक कवि की मौत पर तथा मेरी धरती के लोग।
हरजिंदर सिंह सेठी की एक कविता ‘ढाबे में पहाड़’ के सरोकार यूं हैं- भाई की उंगली पकड़े/ छोटे-छोटे पैर रखता/ पहाड़ से नीचे उतर आया है/ बीर सिंह। बीर सिंह रहेगा/ दिल्ली के किसी होटल या ढाबे में/ फर्श पर लगायेगा झाडू, मांजेगा बर्तन/ चाय का गिलास रखेगा टेबल पर, ग्राहक के सामने/दौड़ेगा इधर उधर/ अलग-अलग आदेशों पर। देर रात गये सो जायेगा/ ढाबे की बेंच पर/ आंखों में सपनों का पहाड़ लिए। बीर सिंह/ हर महीने भेजेगा मनीआर्डर/ अपनी मां के नाम। दिल्ली में रहकर/ रखेगा पहाड़ का ख्याल/ बीर सिंह।
“मेरी धरती के लोग” की कई कविताएं कवि, कविता, शब्द, पुस्तक व आलोचक से संबंधित है। मसलन- मैंने लिखी कविताएं, मैंने नहीं लिखी कविता, कहां-कहां होती है कविता, गायब होते शब्द, शब्द जाल में फंसी कविता, शब्द, कविता आजकल, पहाड़ का कवि, किताब, आलोचक चुप नहीं हैं हम (सुप्रसिद्ध कवि हृदयेश मयंक की एक कविता ‘तुम चुप क्यों हो’ को याद करते हुए), कवि होने का नियम, मित्र गाथा (कवि हृदयेश मयंक के नाम), अधूरी कविता तथा एक कवि की मौत पर। ऐसी ही एक कविता ‘मेरी कविताएं’ की शुरुआती पंक्तियों का भाव देखें- मेरी कविताओं में मिलेंगे/ कपड़ों पर लोहा फिराते धोबी, तरकारी बेचने वाले कुंजड़े, कंधे पर सिलंडर उठाये गैस वाला, मूलभूत सुविधाओं की मांग करते जनजातीय समुदाय के लोग, मिलों कारखानों के गेट पर/ लाल झंडा उठाये नारे लगाते कामगार, जीरो डिग्री ठंड में सिकुड़ते सड़कों पर बैठे किसान, लोहा गलाते लोहार, बढ़ई, मिस्त्री, इमारतसाज, रोजी रोटी के लिए पूरब से पश्चिम भटकते मजदूर। ये हमेशा रहते हैं तैयार हमारी जरूरतें पूरी करने को, बहते पसीने की परवाह नहीं करते, मौन रहकर करते हैं/ राष्ट्र निर्माण।
काव्य संग्रह की शीर्षक कविता ‘मेरी धरती के लोग’ में सृजन व सरोकार का निचोड़ है- मुझे अच्छे लगते हैं ये लोग/ जो गलियों में आते हैं/ गुब्बारे बेचते/ बायस्कोप दिखाते/ बच्चों को बहलाते/ बड़ों से बतियाते हैं।मुझे अच्छे लगते हैं ये लोग/ जो सुबह सवेरे गलियों में झाडू लगाते हैं/ गंदगी हटाते/ शहर का स्वास्थ्य बिगड़ने नहीं देते। मुझे अच्छे लगते हैं ये लोग/ जो धौंकनी चलाते हैं/ लोहा गलाते हैं/ रात पाली में मिलों के साथ जागते हैं/ और लोकल गाड़ी में ऊंघते हैं।
“मेरी धरती के लोग” की समस्त कविताएं मनुष्यता के पक्ष में मजबूती से खड़ी हुई दिखती हैं। पुस्तक की पृष्ठ संख्या 140 है और मूल्य (पेपरबैक संस्करण) 250 रुपए है।
