दृष्टि में आए
दुग्ध-धवल मंजुल
मोगरा के पुष्प।
दिवस ढल रहा,
निशा नायिका
पग-पग आगे बढ़ रही।
मोगरे के ये श्वेत,
सीप-मुक्ता से पुष्प,
पल-पल पांखुरी खोल
मुग्ध सुगंध फैला रहे।
अवनी और अंबर
महक गए।
अभिसारिका कर रही
प्रतीक्षा रजनी की,
केशों में गूंथ वेणी,
महके मोगरा कुसुमों की।
पग से उतार रुनझुन पायल,
प्रियतम को रिझाने
चुपके-चुपके अपने
पुर से निकल गई।
बेला विरदी
