अपनों के बीच जलील होकर जीना,
जिंदगी नहीं कहलाता है।
मृत्यु का क्या है? दिल का धड़कना ठहर गया,
सांसों का विचरना एकाएक थम जाना,
आंखें सदा के लिए ‘मिच’ गईं और तन ‘अकड़’ गया,
समझो कि हमारी ‘जिंदगी का जीवन’ समाप्त हो गया।
इतनी खतरनाक नहीं है, जिसे हम ‘मौत’ कहते हैं।
जिंदगी जीकर, एक न एक दिन हमें चिरनिद्रा में लीन हो जाना है।
इसमें नया क्या है? हैरानी किस बात की?
जीवन के पश्चात मृत्यु, यही जीवन का ‘शाश्वत सत्य’ है।
मृत्यु से क्योंकर भयभीत होना?
आज तो जिंदगी ही हमें डरा रही है!
खासकर भरी बिरादरी में बुजुर्गों की ‘तन्हा जिंदगी’!
जिंदगी के आखिरी पड़ाव में ‘रुसवा होकर जीना’
ही ‘बेमौत आई मौत’ के समान है जी।
मसलन, जीते जी चिता के अंगारों पर चलना है।
दोस्तों, इससे ज्यादा खतरनाक ‘मौत’ क्या होगी?
मौत तो ‘मृत जिस्म’ को जलाती/दफनाती है।
‘जिल्लत जिंदों को लताड़ती/तड़पाती है।’
ऐसे में आप ही न्याय कीजिए-मौत ज्यादा खतरनाक है
या उपेक्षित, तिरस्कृत और अपमानित जिंदगी?
बेशक, युवा पीढ़ी को मेरी बात चाहे कड़वी लगेगी,
मगर ‘मौजूदा परिवेश’ में आज यह अप्रिय स्थिति
‘कहानी घर-घर की’ बन चुकी है।
अपने 80 सालों में जितना मैं जिंदगी की ‘मनहूसी’ को समझ पाया हूं,
अपने ‘खयालात’ आपकी समझ की थाली में परोस दिए हैं।
आमीन/तथास्तु। धन्यवाद।
(ये भी मेरे व्यक्तिगत विचार ही जानें।)
त्रिलोचन सिंह अरोरा
