– तिब्बत की बैरियर झील टूटी, भोटेकोशी फिर उफनी
– गांव खाली, बचाव अभियान तक रोकना पड़ा
नेपाल-तिब्बत सीमा पर हिमालय ने जो तबाही दिखाई है वह केवल एक बाढ़ नहीं, बल्कि भविष्य की चेतावनी है। बुधवार को बर्फ, चट्टानों, पानी और मलबे का पहाड़ भोटेकोशी नदी में उतरा और गांव, सड़कें, पुल, बिजली परियोजनाएं तथा बस्तियां बहाता चला गया। अब उसी इलाके में बनी विशाल बैरियर झील के टूटने/ओवरफ्लो होने से दूसरी बाढ़ का खतरा पैदा हो गया है। नेपाल के रसुवा जिले में लोगों को नदियों से दूर ऊंचे स्थानों पर जाने को कहा गया है और खतरे के कारण बचाव अभियान भी कुछ समय रोकना पड़ा।
बदलते जा रहे हैं मौतों के आंकड़े
मौतों का आंकड़ा लगातार बदल रहा है। शुक्रवार की ताजा अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्टों में नेपाल में मृतकों की संख्या ४७५ से आगे बढ़कर ४८९ तक बताई गई है, जबकि तिब्बत में भी मौतें हुई हैं और दोनों तरफ बड़ी संख्या में लोग अब भी लापता हैं। इसलिए शुरुआती ३५०, ४६९ या १,५०० लापता जैसे आंकड़े इस तेजी से बदलती त्रासदी के अलग-अलग समय के आंकड़े हैं। इस आपदा की भयावहता को उपग्रह चित्रों ने और स्पष्ट कर दिया है।
निकला विनाश का सैलाब
प्रारंभिक वैज्ञानिक विश्लेषण के मुताबिक, लांगतांग लिरुंग के पास पहाड़ की चट्टान का विशाल हिस्सा और उसके ऊपर मौजूद ग्लेशियर टूटकर नीचे गिरा। बर्फ, बोल्डर और चट्टानों का यह विशाल द्रव्यमान संकरी घाटी में उतरते हुए मलबे और पानी के प्रचंड सैलाब में बदल गया। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने इसे ग्लेशियल कोलैप्स से उत्पन्न विशाल मलबा प्रवाह माना है, जिसने करीब १०० किलोमीटर तक नदी प्रणाली को प्रभावित किया और तबाही नेपाल पर रुक भी नहीं गई। बाढ़ का मलबा और शव नदियों के रास्ते भारत तक पहुंच गए। उत्तर प्रदेश के महराजगंज में गंडक नदी से तीन शव बरामद किए गए, जिन्हें नेपाल की बाढ़ में बहकर आया माना जा रहा है। महराजगंज और कुशीनगर में प्रशासन को हाई अलर्ट पर रखा गया है। लेकिन इस त्रासदी को केवल ‘प्राकृतिक आपदा’ कहकर फाइल बंद कर देना सबसे बड़ी भूल होगी।
लगातार गर्म हो रहा है हिमालय
हिमालय लगातार गर्म हो रहा है। ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं, स्थायी रूप से जमी मिट्टी और चट्टानों को बांधे रखने वाली बर्फ कमजोर हो रही है और अत्यधिक बारिश की घटनाएं बढ़ रही हैं। वैज्ञानिक अभी इस विशेष घटना को सीधे जलवायु परिवर्तन का परिणाम घोषित करने में सावधानी बरत रहे हैं, लेकिन गर्म होता हिमालय ऐसे ग्लेशियर-चट्टान ढहने, हिमस्खलन और अचानक बाढ़ के खतरे को बढ़ा रहा है।
हमारी विकास योजनाएं कब बदलेंगी?
समस्या प्रकृति के बदलने की ही नहीं, हमारी योजना के न बदलने की भी है। हम नदी के पुराने बहाव क्षेत्र में सड़क बनाते हैं, संकरी घाटियों में होटल और बाजार खड़े करते हैं, पहाड़ काटकर परियोजनाएं बनाते हैं और सुरक्षा का हिसाब दशकों पुराने वर्षा तथा बाढ़ आंकड़ों से लगाते हैं। हिमालय हर परियोजना को अलग-अलग फाइल में नहीं देखता। ऊपर ग्लेशियर टूटता है तो नीचे सड़क, बांध, पुल, बिजलीघर और पूरा शहर एक ही जलधारा में आ जाता है।
‘भूकंप’ था या पहाड़ टूटने की आवाज?
भारत के राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र ने २६ अगस्त सुबह ८:२२ बजे तिब्बत क्षेत्र में ४.९ तीव्रता की घटना दर्ज की थी। लेकिन बाद के वैज्ञानिक विश्लेषण में संकेत मिला कि विशाल ग्लेशियर-चट्टान धंसने ने खुद भूकंप जैसी ऊर्जा पैदा की। इसलिए ‘भूकंप ने ग्लेशियर तोड़ा’ वाला संबंध अभी सिद्ध नहीं है।
आसमान से दिखी तबाही
उपग्रह की घटना-पूर्व और बाद की तस्वीरों में पहाड़ तथा ग्लेशियर के विशाल हिस्से का गायब होना, नदी का असामान्य रूप से चौड़ा होना और घाटियों में दूर तक मलबा पैâलना दिखाई देता है। यानी यह सामान्य बारिश की बाढ़ नहीं, एक पूरी पर्वतीय श्रृंखला में शुरू हुई ‘वैâस्केडिंग डिजास्टर’ थी।
लाशें यूपी तक पहुंचीं
नेपाल से बहती गंडक-नारायणी नदी में आए सैलाब के साथ शव भारतीय सीमा तक पहुंचे हैं। महराजगंज में मिले शवों की पहचान के लिए नेपाल प्रशासन से संपर्क किया गया है। यूपी के सीमावर्ती जिलों में नदियों की लगातार निगरानी की जा रही है।
अब पुराने आंकड़ों से नहीं चलेगी प्लानिंग
हिमालय के लिए अब हर सड़क, बांध, होटल, पुल और जलविद्युत परियोजना का क्लाइमेट-रिस्क और वैâस्केड-डिजास्टर ऑडिट जरूरी है। सवाल यह नहीं कि अगली बाढ़ कब आएगी; सवाल यह है कि जब पहाड़ दोबारा टूटेगा, तब उसके रास्ते में हमने क्या-क्या खड़ा कर रखा होगा?
फिर फटी बैरियर झील
चीन ने गुरुवार को चेतावनी दी थी कि छोछेन खोला और पुरेपू त्सांगपो के संगम के पास बनी झील में करीब २० लाख घनमीटर पानी जमा है और अगले तीन दिनों में ३० लाख घनमीटर और आ सकता है। शुक्रवार को झील के टूटने की सूचना के बाद भोटेकोशी का जलस्तर बढ़ा और हवाई सर्वेक्षण की तैयारी शुरू हुई।
