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मनपा में ‘नो रिकॉर्डिंग’ का खेल, भ्रष्टाचार को खुली छूट?

 – महासभा की कार्यवाही सार्वजनिक करने की मांग तेज
– मीरा-भायंदर मनपा में पारदर्शिता पर उठे सवाल

सुरेश गोलानी / भायंदर

मीरा-भायंदर महानगरपालिका की महासभा इन दिनों शहर के विकास के लिए नहीं, बल्कि प्रशासनिक गड़बड़ियों और घोटालों को छुपाने के नए-नए तरीकों को लेकर चर्चा में है। इसी मामले को लेकर मनपा की महासभाओं और स्थायी समिति जैसी अन्य समितियों की कार्यवाही को जनता के सामने पारदर्शी बनाने के लिए फोटोग्राफी, ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग और लाइव टेलीकास्ट की मांग अब जोर पकड़ने लगी है। हालांकि, महाराष्ट्र नगर निगम अधिनियम के तहत महासभा की वीडियो रिकॉर्डिंग और लाइव टेलीकास्ट करना कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है, लेकिन लोकतांत्रिक सिद्धांतों और पारदर्शिता को बनाए रखने के लिए इसे बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। पारदर्शिता बढाने, नागरिकों की भागीदारी सुनिश्चित करने और नगरसेवकों की जवाबदेही तय करने के उद्देश्य से देश की विभिन्न महानगरपालिकाओं में महासभा की कार्यवाही की लाइव रिकॉर्डिंग और वेबकास्टिंग को मंजूरी दी गई है। वहीं, भाजपा शासित मनपा में पारदर्शिता को पूरी तरह हाशिए पर धकेल दिए जाने के आरोप लग रहे हैं।
राज्यपाल और मुख्यमंत्री को ई-मेल के माध्यम से पर्यावरण प्रेमी और पत्रकार धीरज परब द्वारा भेजे गए शिकायती पत्र के अनुसार, मनपा में चल रहा यह खेल सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि डिजिटल फुटप्रिंट यानी डिजिटल सबूतों को पूरी तरह मिटाने की एक सोची-समझी साजिश है। इसके पीछे का मकसद बिल्कुल साफ है। अगर महासभा में पारित विवादित प्रस्ताव, हाथापाई और जातिसूचक गाली-गलौज जैसे मामले न्यायालय या पुलिस थाने तक पहुंचते भी हैं, तो इसका कोई सबूत यानी डिजिटल रिकॉर्ड पेश न किया जा सके। रिकॉर्डिंग बंदी के अलावा महासभा में पास हुए ठराव (प्रस्ताव) पर सूचक और अनुमोदक के हस्ताक्षरों को जानबूझकर लटकाने के भी गंभीर आरोप लग रहे हैं। आमसभा में जब कोई प्रस्ताव पास होता है, तो उसे कानूनी रूप देने के लिए प्रस्ताव रखने वाले (सूचक) और उसका समर्थन करने वाले (अनुमोदक) के हस्ताक्षर तय समय के भीतर होना अपेक्षित है। लेकिन मीरा-भायंदर मनपा में इस प्रक्रिया को जानबूझकर लंबा खींचे जाने के आरोप हैं।
कैमरा बंद, सवाल हजार!
मीरा-भायंदर मनपा की महासभाओं में ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग और लाइव टेलीकास्ट नहीं होने से पारदर्शिता पर सवाल ख़ड़े हो रहे हैं। करोडों के टेंडर, पानी, कचरा प्रबंधन और टैक्स जैसे मुद्दों पर होने वाली चर्चाओं का डिजिटल रिकॉर्ड नहीं होने से नागरिकों की निगरानी और नगरसेवकों की जवाबदेही कमजोर होने की आशंका है।

 

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