-मंडाला के स्कूल पर जबरन कार्रवाई रोकने का आदेश
-३६ ‘अनधिकृत’ स्कूलों पर एफआईआर; अदालत बोली—बीच सत्र में स्कूल बंद करना न्याय का उपहास
सामना संवाददाता / मुंबई
एक तरफ सरकार हर बच्चे को शिक्षा देने और स्कूल से जोड़ने के दावे करती है, दूसरी तरफ मुंबई की झुग्गियों के बच्चों को पढ़ाने वाले स्कूलों पर एफआईआर दर्ज हो रही है। ऐसे ही एक मामले में मुंबई हाई कोर्ट ने पुलिस को मंडाला, मानखुर्द स्थित एजुकेयर इंग्लिश स्कूल के खिलाफ किसी भी तरह की कठोर कार्रवाई करने से रोक दिया है। यह स्कूल उन ३६ स्कूलों में शामिल है, जिनके खिलाफ कथित रूप से बिना मान्यता संचालन के आरोप में एफआईआर दर्ज की गई है।
न्यायमूर्ति मिलिंद जाधव ने २१ अगस्त के अंतरिम आदेश में कहा कि प्रथम दृष्टया याचिकाकर्ताओं का मामला विचार योग्य है। अदालत ने खास तौर पर इस बात पर गौर किया कि शैक्षणिक वर्ष पहले ही शुरू हो चुका है। ऐसे समय में आपराधिक कार्रवाई के कारण अचानक स्कूल बंद हो गया और बच्चों को दूसरे स्कूलों में भेजना पड़ा तो यह न्याय के उद्देश्य के खिलाफ होगा।
२०१५ से चल रहा स्कूल, अब एफआईआर
एजुकेयर इंग्लिश स्कूल का संचालन एक ट्रस्ट द्वारा २०१५-१६ से किया जा रहा है। स्कूल मुख्य रूप से आसपास की झुग्गी बस्तियों में रहने वाले परिवारों के बच्चों की शैक्षणिक जरूरत पूरी करता है। रिपोर्ट के अनुसार, अक्टूबर २०१७ में मनपा ने इस स्कूल को केंद्र सरकार के शिक्षा मंत्रालय के यूडीआईएसई प्लेटफॉर्म पर मैप किए जाने संबंधी प्रमाणपत्र भी जारी किया था।
अब सवाल यही उठता है कि जब कोई संस्था वर्षों से स्थानीय बच्चों को पढ़ा रही थी और सरकारी शिक्षा प्रणाली के डेटा प्लेटफॉर्म तक पर दर्ज थी, तो प्रशासनिक कमियों को दूर कराने के बजाय सीधे आपराधिक कार्रवाई तक मामला क्यों पहुंचा? स्कूल के पदाधिकारियों ने एफआईआर रद्द कराने के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। फिलहाल अदालत ने अंतिम पैâसला नहीं दिया है, लेकिन पुलिस को जबरन कार्रवाई से रोककर स्कूल और वहां पढ़ने वाले बच्चों को बड़ी राहत जरूर दी है।
कागज अधूरे तो बच्चे क्यों भुगतें?
यह मामला केवल एक स्कूल की मान्यता का विवाद नहीं है। मुंबई जैसे महानगर में हजारों गरीब परिवार ऐसे स्कूलों पर निर्भर हैं, जहां कम फीस में बच्चे पढ़ पाते हैं। यदि किसी स्कूल ने नियमों का पालन नहीं किया है तो प्रशासन को जवाबदेही तय करनी चाहिए, मान्यता प्रक्रिया पूरी करवानी चाहिए या वैकल्पिक व्यवस्था करनी चाहिए। लेकिन बीच शैक्षणिक सत्र में स्कूल बंद कर देना सीधे बच्चों की शिक्षा पर प्रहार बन सकता है। हाई कोर्ट की टिप्पणी इसी बुनियादी सवाल को रेखांकित करती है—किसी प्रबंधन की कथित गलती की सजा विद्यार्थियों को नहीं दी जा सकती।
सरकार की चुनौती सिर्फ ‘अनधिकृत स्कूल’ बंद कराना नहीं हो सकती। असली जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना है कि एक भी बच्चा स्कूल से बाहर न हो।
मुंबई हाई कोर्ट की अंतरिम रोक फिलहाल एक स्कूल को राहत है, लेकिन इसके पीछे छिपा सवाल पूरी मुंबई की शिक्षा व्यवस्था से है कि नियम जरूरी हैं, मगर क्या नियमों की कीमत बच्चों की पढ़ाई होगी?
सरकार से चार सवाल
२०१५-१६ से चल रहे स्कूल की मान्यता का मुद्दा इतने वर्षों तक क्यों नहीं सुलझा?
मनपा ने २०१७ में प्रमाणपत्र दिया तो उसके बाद नियामकीय प्रक्रिया क्यों अधूरी रही?
३६ स्कूलों पर एफआईआर से पहले वहां पढ़ रहे बच्चों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था बनाई गई थी या नहीं?
शिक्षा विभाग की प्रशासनिक विफलता का बोझ आखिर गरीब परिवारों के बच्चों पर क्यों डाला जाए?
