-मुंबई मेट्रो-७ए का बना-बनाया वायाडक्ट तोड़ने की नौबत
-ढाई मीटर की चूक ने रोका काम; सवाल-डिजाइन पास हुआ कैसे, जिम्मेदार कौन और नुकसान कौन भरेगा?
सामना संवाददाता / मुंबई
मुंबई में हजारों करोड़ रुपये के बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट तेजी से खड़े किए जा रहे हैं, लेकिन मेट्रो-७ए का मामला विकास की रफ्तार से ज्यादा प्लानिंग और जवाबदेही पर सवाल खड़े कर रहा है। अंधेरी पूर्व से छत्रपति शिवाजी महाराज अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे तक बनने वाली मेट्रो-७ए के लगभग एक किलोमीटर लंबे एलिवेटेड हिस्से पर ऐसी तकनीकी चूक सामने आई है कि करीब २५० करोड़ का बना-बनाया काम तोड़कर दोबारा करने की नौबत आ सकती है।
समस्या छोटी-मोटी नहीं है। विले पार्ले पूर्व में बने एलिवेटेड वायाडक्ट की ऊंचाई और मेट्रो चलाने के लिए लगने वाले ओवरहेड बिजली उपकरण को जोड़ने के बाद कुल ऊंचाई एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया द्वारा अनुमत सीमा से करीब २.५ मीटर ज्यादा पड़ रही है। यह इलाका मुंबई एयरपोर्ट के विमान उड़ान मार्ग यानी फनल जोन में आता है, जहां ऊंचाई की पाबंदियां बेहद सख्त होती हैं। सबसे गंभीर सवाल यह है कि यह तथ्य तब सामने आया, जब अधिकांश सिविल निर्माण पूरा हो चुका था।
पहले बना दिया, फिर पता चला ऊंचाई गलत!
फरवरी २०२६ तक पूरा एलिवेटेड वायाडक्ट बन चुका था और एलिवेटेड रैंप का करीब ९५ प्रतिशत निर्माण भी पूरा हो गया था। एयरपोर्ट कॉलोनी स्टेशन का काम भी काफी आगे बढ़ चुका था। अब यदि तकनीकी समाधान नहीं निकला तो लगभग ९४० मीटर के एलिवेटेड हिस्से में बड़े पैमाने पर पुनर्निर्माण करना पड़ सकता है। यानी सवाल सिर्फ २५० करोड़ का नहीं है। सवाल यह भी है कि एयरपोर्ट जैसे संवेदनशील क्षेत्र में ऊंचाई की बुनियादी गणना जांचे बिना निर्माण आखिर शुरू वैâसे हो गया? मेट्रो-७ए के सिविल कंसल्टेंट के रूप में सिस्ट्रा, सीईजी और एसएमसीआईपीएल का कंसोर्टियम काम कर रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, सिस्ट्रा खुद को इस गलती के लिए जिम्मेदार नहीं मान रहा, जबकि एयरपोर्ट अथॉरिटी अभी अतिरिक्त ऊंचाई की अनुमति देने को तैयार नहीं है। एमएमआरडीए का कहना है कि तकनीकी समाधान तलाशा जा रहा है।
करीब ३.४ किलोमीटर लंबी मेट्रो-७ए दरअसल मौजूदा मेट्रो-७ का विस्तार है। इसे अंधेरी पूर्व से अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे तक पहुंचना है और एयरपोर्ट पर भूमिगत मेट्रो-३ से जुड़ना है। लेकिन परियोजना पहले ही कई समय-सीमाएं पार कर चुकी है। इसे मूल रूप से २०२१ में खोलने की योजना थी। अब इस नई तकनीकी अड़चन के बाद वित्त वर्ष २०२६-२७ में भी इसका शुरू होना मुश्किल माना जा रहा है।
मुंबईकर पहले ही मेट्रो निर्माण की खुदाई, यातायात अवरोध और वर्षों की देरी का बोझ उठा चुके हैं। अब उनके टैक्स के २५० करोड़ यदि किसी ऐसी डिजाइन भूल पर फिर खर्च होते हैं जिसे ड्राइंग बोर्ड पर ही पकड़ा जाना चाहिए था, तो इसे महज ‘तकनीकी समस्या’ कहकर टाला नहीं जा सकता। यह इंजीनियरिंग की गलती से अधिक निगरानी और जवाबदेही की परीक्षा है।
जवाबदेही के पांच सवाल
१. ओवरहेड बिजली उपकरण की ऊंचाई मूल डिजाइन में क्यों नहीं जोड़ी गई?
२. डिजाइन की तकनीकी जांच और अनुमोदन करने वाले अधिकारियों ने चूक क्यों नहीं पकड़ी?
३. निर्माण पूरा होने से पहले एयरपोर्ट ऊंचाई मानकों का दोबारा सत्यापन क्यों नहीं हुआ?
४. यदि २५० करोड़ का काम दोबारा करना पड़ा तो पैसा ठेकेदार देगा, सलाहकार देगा या जनता?
५. क्या इस गलती के लिए किसी अधिकारी या सलाहकार की व्यक्तिगत जवाबदेही तय होगी?
