राजेश विक्रांत
कवयित्री शालिनी राय ‘डिम्पल’ कविता के साथ गीत-संगीत व अभिनय में पारंगत होने के साथ उत्तर प्रदेश साहित्य सभा से भी जुड़ी हुई हैं। पेशे से वे शिक्षिका हैं तथा बेसिक शिक्षा विभाग में प्रभारी प्रधानाध्यापिका हैं।
उनकी पुस्तक ‘मेरी प्रथम अनुगूँज’ में 73 कविताएँ हैं। अपनी बात में वे लिखती हैं- “एक समर्थ रचनाकार अपने भावों की अभिव्यक्ति कविता के माध्यम से ही समाज के सामने लाता है। कविता, कवि के अंतर्मन से निकलने वाली तरंगों का वह समूह है, जो कवि के मानस-पटल की अनुभूतियों व कल्पनाओं पर आधारित है। यह पाठक व श्रोता के मानस-पटल व हृदयतल की गहराइयों तक प्रभाव स्थापित करने का एक माध्यम है। यह पुस्तक ‘मेरी प्रथम अनुगूँज’ मुक्तक, छंद, कुण्डलियाँ, ग़ज़ल, गीत, कविता इत्यादि का समावेश है, जो पाठकों को अपनी विविधता के कारण उबाऊ प्रतीत नहीं होगी।”
कवयित्री ने एकदम सही लिखा है। पुस्तक में कविताओं का क्रम इस प्रकार है- माँ सरस्वती, मोम की गुड़िया, योग, कलयुगी संसार, जय हनुमान, वियोग एक स्वप्न, मेरा दर्पण मन, बदलता मौसम, कर्मा, मेरी माँ, स्थिर प्रज्ञ, निंदक, ईश्वर का उपहार माँ, विरह वेदना, सीख ले, प्रेम की पाती (गीत), प्रीत का बंधन अनोखा (गीत), मजदूर दिवस, श्रृंगारिक व आध्यात्मिक संदेश, बसंती बहार, सियासत की लड़ाई, कुण्डलिया छंद, प्रेम का श्रृंगार (मुक्तक काव्य), नियति करती नहीं अन्याय, ठहराव, स्वप्रेम, भिगाओ मोहे साँवरे, सतरंगी मन, मुलाकात अब कहाँ, बीते लम्हें, मुक्त न होते लोग, बहक जा अब कहीं, आओ सखी संग-संग चलें, नारी (मिशन शक्ति), नारी (शक्ति का अवतार), समर्पण, कुछ ऐसा मीठा बोल प्रिये, मर्यादा जग को रही सिखा, नैतिकता का करें प्रसार, हमने प्रेम बचाकर रखा, परचम अपना लहराऊँगी, सपने, आलिंगन, परिवर्तन संसार का नियम है, आपकी नजर (विधाता छंद), जन-जन के श्रीराम, मुझे ढूँढ़ लेना (मुक्तक), बसंत ऋतु, प्रेम क्या है, राम तुम भी आओ ना, प्रेम की पराकाष्ठा, हम भी तो अपने गुरु ही हैं, तुमसे सीखा, हिन्दी, नारी की स्थिति, कब्रगाह औरतें, नारी तुम्हें नमन, राम बसे मेरे अंतर्मन में, गूलर का फूल, विवेकानंद, मानव जीवन को पाया है, विरोधाभास प्रेम, अधूरा प्रेम, जीवन एक समर्पण, जिंदगी एक सफर, साड़ी (सुंदरता के छह गज), स्त्री, देवनागरी लिपि, विश्व हिन्दी दिवस, मन्नत का धागा, मधुमास, चन्द्रयान एवं चन्द्रविमान।
अपनी संस्था ‘शालिनी साहित्य सृजन’ के माध्यम से अपने जीवन के उत्तरार्द्ध काल में साहित्य की सेवा में लगकर अपने जीवन को एक नया आयाम देने वाली आज़मगढ़ की कवयित्री डिम्पल की रचनाओं की गहराई सराहनीय है। उन्होंने हर विषय पर लेखनी चलाई है। ‘मेरी माँ’ कविता की मिसाल लें-
तेरी कोख से ही तो मेरी माँ,
मेरे जीवन का आरम्भ हुआ।
तुझसे मेरा अस्तित्व बना,
संसार मेरा प्रारम्भ हुआ।।
अस्तित्व-विहीन मैं तेरे बिन,
स्नेहिल-सा हृदय उदार बनी।
तू अद्भुत प्रेम का सार बनी,
माँ तुम ही मेरा संसार बनी।।
माँ तुमसे मिली सुन्दर काया,
इस जीवन का शुभारम्भ हुआ।
तुझसे मेरा अस्तित्व बना,
संसार मेरा प्रारम्भ हुआ।।
एक अन्य कविता ‘श्रृंगारिक व आध्यात्मिक संदेश’ बेमिसाल है-
तुम शीतल, शांत पूर्णिमा सी,
मैं बन आया चितचोर प्रिये।
जो बरसो तुम बादल बनकर,
मैं नाचूँ बनकर मोर प्रिये।
जीवन तो चार दिवस का है,
पर रोज लगे यहाँ मेला है।
भीड़ भरी इस महफिल में,
हर व्यक्ति यहाँ अकेला है।
इस समय-चक्र के खेल में तो,
ना लगे किसी का जोर प्रिये।
जो बरसो तुम बादल बनकर,
मैं नाचूँ बनकर मोर प्रिये।
शालिनी राय ‘डिम्पल’ ने ‘हमने प्रेम बचाकर रखा’ में लिखा है कि-
नफरत, अहम का चौर चला,
तो हमने प्रेम बचाकर रखा।
कड़ी धूप में देकर छाया,
हमने प्रेम कमाकर रखा।
सिर पर कहीं न ये चढ़ जाए,
अपना अहम दबाकर रखा।
सीलन न आ जाए मन में,
मन को धूप दिखाकर रखा।
बाहर दिखा अँधेरा इतना,
दिल का दीप जलाकर रखा।
किया सम्मान सभी का हमने,
अपना शीश नवाकर रखा।
कुल मिलाकर ‘मेरी प्रथम अनुगूँज’ में हर तरह की रचनाएँ हैं। यह विविधरंगी कविताओं का एक गुलदस्ता है। इसका प्रकाशन स्पीच पब्लिकेशन, आज़मगढ़ ने किया है। 152 पृष्ठों की इस पेपरबैक कृति का मूल्य 200 रुपये है।
