मुख्यपृष्ठधर्म विशेषवैज्ञानिक और पौराणिक है छठ पर्व

वैज्ञानिक और पौराणिक है छठ पर्व

शीतल अवस्थी

भगवान भास्कर को अर्घ्य देने तक चलने वाला छठ का महापर्व कभी माता सीता ने भी रखा था। छठ पर्व का वर्णन रामायण काल से लेकर महाभारत काल तक में होता है। किंवदंति के अनुसार ऐतिहासिक नगरी मुंगेर के सीता चरण में कभी माता सीता ने छह दिनों तक रह कर छठ पूजा की थी। पौराणिक कथाओं के अनुसार १४ वर्ष वनवास के बाद जब भगवान राम अयोध्या लौटे तो रावण वध के पाप से मुक्त होने के लिए ऋषि-मुनियों के आदेश पर उन्होंने राजसूय यज्ञ करने का फैसला लिया। इसके लिए मुग्दल ऋषि को आमंत्रण दिया गया था, लेकिन मुग्दल ऋषि ने भगवान राम एवं सीता को अपने ही आश्रम में आने का आदेश दिया। ऋषि की आज्ञा पर भगवान राम एवं सीता माता स्वयं वहां गए तब उन्हें इसके पूजा-पाठ के बारे में बताया गया। मुग्दल ऋषि ने माता सीता पर गंगा जल छिड़क कर पवित्र किया एवं कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष षष्ठी तिथि को सूर्यदेव की उपासना करने का आदेश दिया। यहीं रह कर माता सीता ने छह दिनों तक सूर्यदेव भगवान की पूजा की थी।
छठ को महापर्व इसलिए भी कहा जाता है, क्योंकि सूर्य प्रत्यक्ष देवता हैं। छठ पूजा का वर्णन पुराणों में भी मिलता है। अथर्ववेद में भी छठ पर्व का उल्लेख है जो इसकी महानता और प्राचीनता को दर्शाता है। प्रथम मनु स्वायम्भुव के पुत्र प्रियव्रत के कोई संतान नहीं थी। एक बार महाराज ने महर्षि कश्यप से दुख व्यक्त कर पुत्र प्राप्ति का उपाय पूछा। महर्षि ने पुत्रेष्टि यज्ञ का परामर्श दिया। यज्ञ के फलस्वरूप महारानी को पुत्र जन्म हुआ, किंतु वह शिशु मृत था। पूरे नगर में शोक व्याप्त हो गया। महाराज शिशु के मृत शरीर को अपने वक्ष से लगाये प्रलाप कर रहे थे, तभी एक आश्चर्यजनक घटना घटी। सभी ने देखा आकाश से एक विमान पृथ्वी पर आ रहा है। विमान में एक ज्योर्तिमय दिव्याकृति नारी बैठी हुई थी। राजा द्वारा स्तुति करने पर देवी ने कहा, मैं ब्रह्मा की मानस पुत्री षष्ठी देवी हूं। मैं विश्व के समस्त बालकों की रक्षिका हूं और अपुत्रों को पुत्र प्रदान करती हूं। देवी ने शिशु के मृत शरीर का स्पर्श किया। वह बालक जीवित हो उठा। महाराज के प्रसन्नता की सीमा न रही। वे अनेक प्रकार से षष्ठी देवी की स्तुति करने लगे। एक कथा के अनुसार जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए, तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखा। तब उनकी मनोकामनाएं पूरी हुर्इं तथा पांडवों को राजपाट वापस मिल गया। इस संबंध में मान्यता है कि मगध सम्राट जरासंध के एक पूर्वज का कुष्ठ रोग दूर करने के लिए शाकलद्वीपीय मग ब्राह्मणों ने सूर्योपासना की थी। कहते हैं कि राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या ने कार्तिक की षष्ठी को सूर्य की उपासना की तो च्यवन ऋषि के आंखों की ज्योति वापस आ गई। छठ के साथ स्कंद पूजा की भी परंपरा जुड़ी है। भगवान शिव के तेज से उत्पन्न बालक स्कंद की छह कृतिकाओं ने स्तनपान करा रक्षा की थी। इसी कारण स्कंद के छह मुख हैं और उन्हें कार्तिकेय नाम से पुकारा जाने लगा। कार्तिक से संबंध होने के कारण षष्ठी देवी को स्कंद की पत्नी ‘देवसेना’ नाम से भी पूजा जाने लगा। कार्तिक मास शुक्लपक्ष की षष्ठी का उल्लेख स्कंद-षष्ठी के नाम से भी किया गया है। वर्षकृत्यविधि में प्रतिहार-षष्ठी के नाम से किया प्रसिद्ध सूर्यषष्ठी की चर्चा की गई है। इस व्रत की प्राचीनता एवं प्रामाणिकता भी परिलक्षित होती है। भगवान सूर्य के इस पावन व्रत में शक्ति व ब्रह्म दोनों की उपासना का फल एक सा प्राप्त होता है।
आज छठ बिहार और उत्तर प्रदेश से ही जुड़ा आंचलिक नहीं रह गया है बल्कि दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई जैसे महानगरों में भी श्रद्धाभाव से मनाया जाने वाले पर्व का रूप धारण कर चुका है। छठ पर्व की परंपरा में बहुत ही गहरा विज्ञान छिपा हुआ है, षष्ठी तिथि एक विशेष खगौलीय अवसर है। उस समय सूर्य की पराबैंगनी किरणें पृथ्वी की सतह पर सामान्य से अधिक मात्रा में एकत्र होती हैं। उसके संभावित कुप्रभावों से हमारी यथासंभव रक्षा करने का सामर्थ्य इस परंपरा में है। पर्व पालन से सूर्य की पराबैंगनी किरणों के हानिकारक प्रभाव से जीवों की रक्षा संभव है। पराबैंगनी किरणों का उपयोग कर वायुमंडल अपने ऑक्सीजन तत्त्व को संश्लेषित कर उसे उसके एलोट्रोप ओजोन में बदल देता है। इससे पराबैंगनी किरणों का अधिकांश भाग पृथ्वी के वायुमंडल में ही अवशोषित हो जाता है। सामान्य अवस्था में मनुष्यों पर उसका कोई विशेष हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता, बल्कि उस धूप द्वारा हानिकारक कीटाणु मर जाते हैं, जिससे मनुष्य या जीवन को लाभ ही होता है। सूर्य की कुछ पराबैगनी किरणें चंद्रमा सतह से परावर्तित तथा कुछ गोलीय अपवर्तित होती हुई, पृथ्वी पर पुन: सामान्य से अधिक मात्रा में पहुंच जाती हैं। वायुमंडल के स्तरों से आवर्तित होती हुई, सूर्यास्त तथा सूर्योदय को यह और भी सघन हो जाती है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार यह घटना कार्तिक तथा चैत्र मास की अमावस्या के छह दिन उपरांत आती है। इसी वजह से इस दिन छठ पर्व मनाया जाता है। इसीलिए छठ का त्योहार भगवान सूर्य को धरती पर जीवन रक्षा और धन–धान्य की प्रचुरता के लिए धन्यवाद देने के लिए मनाया जाता है। लोग अपनी विशेष इच्छाओं की पूर्ति के लिए भी इस पर्व को मनाते हैं।

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