– फडणवीस क्राइम कंट्रोल करने में फेल
धीरेंद्र उपाध्याय / मुंबई
सपनों के शहर मुंबई में आज बचपन सिसक रहा है। यह एक ऐसी सिसक है, जो रोजाना ९ नौनिहालों के अपराध का शिकार होने की कड़वी सच्चाई में दबी हुई है। मुंबई के साथ ही ठाणे और पुणे जैसे शहरी इलाकों समेत महाराष्ट्र के कई हिस्सों में बच्चों पर सबसे ज्यादा खतरा मंडरा रहा है। आलम यह है कि महाराष्ट्र में भी हर २३ मिनट में एक और एक दिन में ६१ से अधिक नौनिहाल अपराध के शिकार हो रहे हैं। सबसे ज्यादा मामले किडनैपिंग और यौन शोषण के हैं।
ये आंकड़े बता रहे हैं कि बचपन न सिर्फ असुरक्षित है, बल्कि उसकी मासूमियत भी दरिंदगी के साए में है। मुंबई समेत राज्य में ये हालात बयां कर रहे हैं कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का गृह विभाग क्राइम कंट्रोल करने में नाकाम साबित हो रहा है।
मासूमों के खिलाफ २२,३९० अपराध
महाराष्ट्र में बच्चों के खिलाफ अपराधों की स्थिति चिंताजनक स्तर पर पहुंच गई है। एनसीआरबी (राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो) के अनुसार, महाराष्ट्र में वर्ष २०२३ में बच्चों के खिलाफ २२,३९० अपराध दर्ज किए गए थे।
मासूमों के खिलाफ तेजी से बढ़ रहे हैं अपराध!
गृह मंत्रालय साधे है मौन
महायुति शासन में बच्चों के खिलाफ अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं। एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष २०२१ में दर्ज १७,२६१ मामलों की तुलना में २०२३ में बच्चों के खिलाफ अपराधों में लगभग ३० प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष २०२१ से २०२२ के बीच बढ़ोतरी दर २०.२८ फीसदी रही। राज्य इस श्रेणी में देश में दसवें स्थान पर है। राज्य में बच्चों से जुड़े अपराधों में अपहरण के मामले १२,२५२ यानी ५४.७२ फीसदी दर्ज किए गए। अकेले मुंबई, ठाणे और पुणे में इन मामलों का लगभग ३० फीसदी हिस्सा रहा।
पॉक्सो मामलों में ९८ फीसदी पीड़ित लड़कियां
यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम के तहत २०२३ में ८,६३९ मामले यानी ३८.५८ फीसदी दर्ज हुए। इनमें से ८,५१९ यानी ९८.१६ फीसदी पीड़ित लड़कियां थीं, जो यौन अपराधों के लैंगिक असंतुलन को उजागर करता है।
मुंबई, ठाणे और पुणे हॉटस्पॉट
राज्य के कुल ४९ जिलों में सबसे ज्यादा अपराध मुंबई कमिश्नरेट में हैं। यहां ३,११० मामले यानी १३.८९ फीसदी, ठाणे में १,६३८ यानी ७.३२ फीसदी और पुणे में १,२३४ यानी ५.५१ फीसदी दर्ज हुए। शीर्ष पांच जिलों में कुल ७,८७६ मामले यानी ३५.१८ फीसदी दर्ज किए गए।
हर मामला सुरक्षा की विफलता का प्रतीक
बाल अधिकार संगठन चाइल्ड राइट्स एंड यू की क्षेत्रीय निदेशक क्रिएन रबाडी के मुताबिक, यह देखना सकारात्मक है कि अपराधों की रिपोर्टिंग बढ़ रही है। लेकिन हर मामला इस बात का सबूत है कि हम अपने सबसे कमजोर नागरिकों और बच्चों की सुरक्षा में नाकाम हो रहे हैं। बाल संरक्षण को प्राथमिकता देने के लिए मजबूत रोकथाम, त्वरित कार्रवाई और कठोर जवाबदेही जरूरी है।
