मुख्यपृष्ठधर्म विशेष‘पुढच्या वर्षी लवकर या’-नम आंखों से बप्पा की विदाई

‘पुढच्या वर्षी लवकर या’-नम आंखों से बप्पा की विदाई

-दस दिनों तक घर-आंगन में गूंजे मंगलगीत, अब विसर्जन के साथ भक्तों की पुकार-अगले वर्ष जल्दी आना गणपति बप्पा!

ढोल-ताशों की गूंज, गुलाल से रंगी सड़कें और चारों ओर ‘गणपति बप्पा मोरया’ का जयघोष। गणेशोत्सव के उल्लास के बाद अब भगवान श्रीगणेश को विदाई देने की घड़ी आती है। दस दिनों तक घरों और सार्वजनिक मंडलों में विराजमान रहे विघ्नहर्ता अनंत चतुर्दशी पर विसर्जन के लिए निकलते हैं तो उत्साह के बीच भक्तों की आंखें भी नम हो जाती हैं।
गणपति का आगमन परिवार में किसी प्रिय अतिथि के आने जैसा होता है। स्थापना के साथ घर में पूजा, आरती, भजन और प्रसाद का क्रम शुरू हो जाता है। बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक बप्पा की सेवा में जुटते हैं। कोई मोदक बनाता है, कोई फूलों से सजावट करता है तो कोई सुबह-शाम की आरती की जिम्मेदारी संभालता है। यही कारण है कि विसर्जन के समय प्रतिमा से भावनात्मक लगाव स्पष्ट दिखाई देता है।
विसर्जन अंत नहीं, पुनरागमन का विश्वास
सनातन परंपरा में प्रतिमा विसर्जन को भगवान की समाप्ति नहीं माना जाता। मिट्टी से बनी प्रतिमा जल में मिलकर पुनः प्रकृति का हिस्सा बन जाती है। इसका आध्यात्मिक संदेश है कि संसार में प्रत्येक साकार रूप को अंततः पंचतत्व में विलीन होना है, लेकिन परमात्मा और उसकी चेतना सदैव विद्यमान रहती है।
भक्त गणपति से विदाई लेते समय कहते हैं-
गणपति बप्पा मोरया!
पुढच्या वर्षी लवकर या!
अर्थात-हे गणपति बप्पा, अगले वर्ष जल्दी आइए। इस उद्घोष में बिछड़ने की पीड़ा के साथ दोबारा मिलने का विश्वास भी समाया हुआ है।
उत्तर पूजा के बाद निकलती है यात्रा
विसर्जन से पहले भगवान श्रीगणेश की उत्तर पूजा की जाती है। उन्हें दूर्वा, पुष्प, मोदक, नारियल और फल अर्पित किए जाते हैं। परिवार के सदस्य आरती करके पूजा में हुई भूल के लिए क्षमा मांगते हैं। इसके बाद प्रतिमा को स्थापित स्थान से धीरे से आगे बढ़ाया जाता है और विसर्जन यात्रा आरंभ होती है।
सड़कों पर ढोल-ताशों और भजनों के बीच भक्त नाचते-गाते हैं। सार्वजनिक मंडलों की बड़ी प्रतिमाओं के दर्शन के लिए रास्तों पर जनसैलाब उमड़ता है। कहीं पारंपरिक लेझीम दिखाई देती है तो कहीं सामाजिक संदेश देती झांकियां आकर्षण बनती हैं।
पर्यावरण की रक्षा भी बप्पा की सेवा
श्रद्धा के साथ पर्यावरण की सुरक्षा भी आवश्यक है। मिट्टी और प्राकृतिक रंगों की प्रतिमा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। फूल, प्लास्टिक, थर्मोकोल और सजावटी सामग्री को नदी या समुद्र में डालने के बजाय अलग निर्माल्य पात्र में जमा करना चाहिए। छोटी प्रतिमाओं का विसर्जन कृत्रिम तालाब अथवा घर में भी किया जा सकता है।
विसर्जन के बाद मंडप खाली हो जाता है, लेकिन बप्पा की स्मृतियां और आशीर्वाद भक्तों के मन में बने रहते हैं। विदाई के समय हर जुबान पर बस यही प्रार्थना होती है-
हे विघ्नहर्ता! हमारे दुख और संकट अपने साथ ले जाइए, घर में सुख-शांति बनाए रखिए और अगले वर्ष फिर जल्दी आइए।

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