नरेंद्र गुप्ता
जीवदया का अर्थ है, सभी जीवों के प्रति दया, करुणा और सहानुभूति रखना। यह भावना हमें सिखाती है कि हम इस धरती के अकेले स्वामी नहीं, बल्कि सभी जीवों के सहयात्री हैं। गाय, कुत्ते, बिल्ली, पक्षी, गधा, घोड़ा, सांड़ हर जीव इस धरती पर उतना ही अधिकार रखता है जितना हम। भारत की प्राचीन परंपराएं और धर्म ग्रंथ अहिंसा और जीवदया को सर्वोच्च मानते हैं। जैन धर्म में तो हर जीव को सम्मान देना और हिंसा से दूर रहना जीवन का मूल उद्देश्य माना गया है। हिंदू धर्म में भगवान श्रीकृष्ण ने गायों की सेवा को सर्वोच्च कर्म बताया, तो बौद्ध धर्म करुणा को जीवन का आधार मानता है।
आज के युग में जीवदया इसलिए भी जरूरी है कि क्योंकि तेज होते शहरीकरण, प्रदूषण और मानवीय स्वार्थ की दौड़ ने बेजुबानों को सड़क पर बेसहारा कर दिया है। कूड़े के ढेर में भोजन खोजती गायें, कुत्ते, गर्मी में प्यास से तड़पते पक्षी, सर्दियों में ठिठुरते जानवर ये सब हमारी चुप्पी और संवेदनहीनता पर सवाल खड़े करते हैं। यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ी संवेदनशील और जिम्मेदार बने, तो हमें बच्चों में बचपन से ही जीवदया के संस्कार देने होंगे। जब कोई बच्चा भूखे जानवर को रोटी डालता है या घायल पक्षी को पानी पिलाता है, तब वह सिर्फ एक काम नहीं कर रहा होता, वह एक इंसान बन रहा होता है। हर जीव इस पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा है। यदि हम एक जीव को मिटा दें, तो प्रकृति का संतुलन बिगड़ता है। जीवदया केवल प्राणी मात्र पर दया नहीं, यह धरती और भविष्य की रक्षा है। इसके साथ ही यह ईश्वर की सच्ची सेवा भी है, क्योंकि हर जीव में परमात्मा का अंश है। जीवदया कोई दिखावा नहीं, कोई महंगा उपकार नहीं, यह तो वो `नरसी’ भाव है जो मन को निर्मल करता है, आत्मा को तृप्त करता है और समाज को एक बेहतर दिशा देता है।
आइए, हम सभी यह संकल्प लें कि हम बेजुबानों को तकलीफ में नहीं देखेंगे। उनका भोजन पानी, और छाया का ध्यान रखेंगे, घायल या बीमार जानवर को उपचार दिलाएंगे और समाज में जीवदया के लिए जागरूकता पैâलाएंगे। जहां करुणा है, वहीं ईश्वर है। जहां जीवदया है, वहीं सच्चा धर्म है।
