राधेश्याम सिंह / विरार
वसई-विरार पुलिस कमिश्नरेट क्षेत्र में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में खतरनाक बढ़ोतरी ने समाज और अभिभावकों की चिंताओं को और गहरा कर दिया है। पिछले छह महीनों के भीतर दर्ज मामलों के आंकड़े चौंकाने वाले हैं और यह सवाल खड़ा कर रहे हैं — “क्या आज भी घर से बाहर निकली लड़की सुरक्षित है?” पुलिस के रिकॉर्ड के अनुसार, अधिकांश मामलों में आरोपी पीड़िता के जान-पहचान वाले — जैसे रिश्तेदार, दोस्त, पड़ोसी या यहां तक कि परिवार के सदस्य ही निकले। कई घटनाओं में लड़कियों को झांसे या लालच में फंसाकर उनका यौन उत्पीड़न किया गया।
महिला अपराध के छह महीने के आंकड़े:
| बलात्कार (18 वर्ष से ऊपर) |
112 |
| बलात्कार (18 वर्ष से कम) |
92 |
| विनयभंग (18 वर्ष से ऊपर) |
152 |
| विनयभंग (18 वर्ष से कम) |
64 |
इन आंकड़ों से साफ है कि युवतियों और किशोरियों पर खतरा बढ़ता जा रहा है। खासकर स्कूल-कॉलेज जाने वाली छात्राओं और कामकाजी महिलाओं के लिए असुरक्षित माहौल गहरी चिंता का विषय बन गया है।
हालात की गंभीरता को देखते हुए पुलिस प्रशासन ने अंधेरे रास्तों, सुनसान इलाकों, स्काईवॉक, और झुग्गी बस्तियों में गश्त बढ़ा दी है। असामाजिक तत्वों और शराबियों की बढ़ती मौजूदगी को देखते हुए इन क्षेत्रों को ‘हाई रिस्क जोन’ घोषित कर विशेष निगरानी शुरू की गई है।
एपीआई शिवकुमार गायकवाड ने बताया कि पुलिस ने अब तक 97% मामलों को सुलझाया है और दोषियों को गिरफ्तार किया गया है। उन्होंने कहा, “अगर किसी महिला या बालिका को कोई परेशान करता है, तो वे बिना झिझक पुलिस से संपर्क करें। हम हर समय मदद के लिए तत्पर हैं।”
विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों का मानना है कि सिर्फ पुलिस की सख्ती काफी नहीं है। मां-बाप और स्कूलों को बच्चों को ‘गुड टच’ और ‘बैड टच’ की शिक्षा देनी चाहिए। खासकर मां को अपनी बच्चियों को जागरूक बनाना चाहिए ताकि वे गलत व्यवहार को समय रहते पहचान सकें और शिकायत करने में संकोच न करें।
शिवकुमार गायकवाड ने भी इस बात पर जोर दिया कि, “महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा केवल पुलिस की नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।”