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सिंहस्थ कुंभ की परंपरा पर प्रलाप…सरकार की पुरोहित प्रशिक्षण योजना पर भड़का ब्राह्मण समाज!

बोला- यह कोई स्किल डेवलपमेंट कोर्स नहीं, हमारी पीढ़ियों की है विरासत

सुनील ओसवाल / मुंबई

त्र्यंबकेश्वर और नाशिक में होनेवाले सिंहस्थ कुंभ के लिए महाराष्ट्र सरकार की एक योजना ने तीर्थ क्षेत्र में हलचल मचा दी है। सरकार कुंभ के दौरान प्रशिक्षित पुरोहितों की संख्या बढ़ाने की योजना बना रही है, जिसके तहत कौशल विकास योजना के अंतर्गत लोगों को पौरोहित्य सिखाने के लिए प्रशिक्षण दिया जाएगा, लेकिन यह प्रस्ताव जैसे ही सामने आया, त्र्यंबकेश्वर और नाशिक के परंपरागत तीर्थोपाध्ये (तीरथ पति) भड़क उठे हैं। उनका साफ कहना है पौरोहित्य कोई शॉर्ट टर्म कोर्स नहीं, यह हमारी पीढ़ियों की परंपरा और आस्था का हिस्सा है। सरकार इसे औद्योगिक प्रशिक्षण की तरह पेश न करे। यह तीर्थयात्रा की एक परंपरा है, कोई औद्योगिक प्रशिक्षण पाठ्यक्रम नहीं और सरकार को धार्मिक क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
सरकारी प्रयोगशाला नहीं है कुंभ
त्र्यंबकेश्वर और नाशिक के ब्राह्मण समाज का तीखा विरोध सरकार की उस सोच के प्रति है, जिसमें परंपरा को प्रशासनिक योजना के हिसाब से तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है। प्रयागराज कुुंभ का हवाला देते हुए यह तर्क दिया गया है कि वहां पुरोहितों की संख्या कम पड़ी थी, इसलिए अब महाराष्ट्र में पहले से ही ट्रेंड पुरोहित तैयार किए जाएंगे।
खबर है कि प्रयागराज में आयोजित कुंभ मेले में पुजारियों की संख्या में कमी का हवाला देते हुए सरकार अब श्रीक्षेत्र त्र्यंबकेश्वर और नासिक में पुजारियों को प्रशिक्षण देकर उनकी संख्या बढ़ाने का प्रयास करेगी। इसके लिए न्यूनतम कौशल के तहत प्रशिक्षण देने पर भी विचार किया जा रहा है। हालांकि, दोनों तीर्थ क्षेत्रों के पुजारी संघों ने इसका विरोध किया है। उन्होंने कहा है कि यह तीर्थयात्रा की एक परंपरा है, कोई औद्योगिक प्रशिक्षण पाठ्यक्रम नहीं और सरकार को धार्मिक क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। दीवाली बाद पुरोहिती का प्रशिक्षण
-नासिक और त्र्यंबकेश्वर में अगले साल ३१ अक्टूबर २०२६ को सिंहस्थ उत्सव शुरू होगा। इसी सिलसिले में पुजारियों के प्रशिक्षण का एक नया मुद्दा सामने आया है।
-राज्य सरकार की कौशल योजना के तहत यह प्रशिक्षण देने की योजना है। बताया जाता है कि प्रयागराज में आयोजित कुंभ मेले में लगभग ६५ करोड़ लोग आए थे।
-उस समय वहां पुजारियों की संख्या कम थी, इसलिए अब नासिक और त्र्यंबकेश्वर में संख्या में इस कमी से बचने के लिए दीवाली के बाद पुरोहिती का प्रशिक्षण दिया जाएगा। हालांकि, नासिक और त्र्यंबकेश्वर के पुजारियों ने इसका कड़ा विरोध किया है।

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