-अरुण कुमार गुप्ता
राजधानी दिल्ली में लोकतंत्र, विरोध के अधिकार और पुलिस की शक्तियों को लेकर बहस तेज हो गई है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी के तिरंगा मार्च के दौरान १०० से अधिक लोगों को हिरासत में लिए जाने के बाद सवाल उठ रहे हैं कि आखिर शांतिपूर्ण विरोध और कानून-व्यवस्था के खतरे के बीच अंतर तय करने का आधार क्या है? रिपोर्ट के मुताबिक, कनॉट प्लेस में आयोजित मार्च में करीब २,००० लोग शामिल हुए थे। पुलिस ने निषेधाज्ञा के उल्लंघन का हवाला देते हुए कार्रवाई की। सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन की अध्यक्ष नेहा बोरा को भी हिरासत में लिया गया। बाद में दीपके को जमानत मिली और बोरा को रिहा कर दिया गया। पुलिस का तर्क है कि बिना अनुमति प्रदर्शन करने और सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका के मद्देनजर कार्रवाई की गई। प्रशासन की जिम्मेदारी है कि राजधानी में यातायात, नागरिकों की आवाजाही और सार्वजनिक सुरक्षा बाधित न हो। लेकिन इस तर्क के साथ एक दूसरा सवाल भी खड़ा होता है। क्या किसी प्रदर्शन में शामिल होने की आशंका मात्र से लोगों को हिरासत में लेना उचित है? और यदि कार्रवाई एहतियाती है, तो उसकी जरूरत, अवधि और कानूनी आधार की समीक्षा कौन करेगा?
गिरफ्तारी पहले, गुनाह बाद में?
राजधानी दिल्ली में लोकतंत्र, विरोध के अधिकार और पुलिस की शक्तियों को लेकर बहस तेज हो गई है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी के तिरंगा मार्च के दौरान १०० से अधिक लोगों को हिरासत में लिए जाने के बाद सवाल उठ रहे हैं कि आखिर शांतिपूर्ण विरोध और कानून-व्यवस्था के खतरे के बीच अंतर तय करने का आधार क्या है? रिपोर्ट के मुताबिक, कनॉट प्लेस में आयोजित मार्च में करीब २,००० लोग शामिल हुए थे। पुलिस ने निषेधाज्ञा के उल्लंघन का हवाला देते हुए कार्रवाई की। सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन की अध्यक्ष नेहा बोरा को भी हिरासत में लिया गया। बाद में दीपके को जमानत मिली और बोरा को रिहा कर दिया गया। पुलिस का तर्क है कि बिना अनुमति प्रदर्शन करने और सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका के मद्देनजर कार्रवाई की गई। प्रशासन की जिम्मेदारी है कि राजधानी में यातायात, नागरिकों की आवाजाही और सार्वजनिक सुरक्षा बाधित न हो। लेकिन इस तर्क के साथ एक दूसरा सवाल भी खड़ा होता है। क्या किसी प्रदर्शन में शामिल होने की आशंका मात्र से लोगों को हिरासत में लेना उचित है? और यदि कार्रवाई एहतियाती है, तो उसकी जरूरत, अवधि और कानूनी आधार की समीक्षा कौन करेगा?
