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दिल्ली लाइव :  मुख्यमंत्री के रिकॉर्ड में झोल, आम वोटर से सौ सवाल!

अरुण कुमार गुप्ता

दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर सियासी घमासान तेज है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के मतदाता रिकॉर्ड में ही सत्यापन संबंधी विसंगति सामने आने के बाद विपक्ष को चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने का नया मुद्दा मिल गया है। विपक्ष का सवाल सीधा है। जब मुख्यमंत्री के रिकॉर्ड में भी गड़बड़ी की आशंका सामने आ सकती है तो आम मतदाता की सूची कितनी सुरक्षित है? आखिर जिन लोगों के पास दस्तावेजों की कमी है या जो सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने में सक्षम नहीं हैं, उनके मतदान के अधिकार की गारंटी कौन लेगा? दरअसल, विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के मतदाता रिकॉर्ड में उम्र संबंधी विसंगति चिह्नित हुई थी। इसके बाद सत्यापन की प्रक्रिया पूरी की गई और उनका रिकॉर्ड वैध पाया गया। यानी मुख्यमंत्री के मामले में जांच के बाद स्थिति स्पष्ट हो गई, लेकिन यही घटनाक्रम आम मतदाताओं के लिए कई सवाल खड़े करता है। विपक्ष का कहना है कि यदि सत्ता के शीर्ष पर बैठे व्यक्ति के रिकॉर्ड में विसंगति सामने आ सकती है तो आम नागरिकों के रिकॉर्ड में गड़बड़ी की आशंका को हल्के में वैâसे लिया जा सकता है? विपक्ष की चिंता सिर्फ एक नाम या एक मामले तक सीमित नहीं है। सवाल उस प्रक्रिया का है, जिसमें मतदाता को अपनी पहचान और पात्रता साबित करने के लिए दस्तावेज पेश करने पड़ते हैं। पुराने दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने, नाम या उम्र में मामूली अंतर होने अथवा परिवार के रिकॉर्ड में विसंगति होने पर आम नागरिकों को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि किसी भी पात्र मतदाता का नाम हटाने से पहले उसे पर्याप्त अवसर और निष्पक्ष सुनवाई मिले। विपक्ष लगातार मांग कर रहा है कि विशेष गहन पुनरीक्षण की पूरी प्रक्रिया पारदर्शी हो। कितने मतदाताओं के नामों में विसंगतियां मिलीं, कितनों को नोटिस भेजे गए, कितने मामलों का निपटारा हुआ और कितने पात्र मतदाताओं के नाम सूची से बाहर हुए इन सभी आंकड़ों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
जनता के वोट का हिसाब कब देगा आयोग?
लोकतंत्र में सरकार बनाने का अधिकार जनता के पास है, लेकिन अगर उसी जनता का नाम मतदाता सूची से गायब हो जाए तो उसके वोट की जिम्मेदारी कौन लेगा? मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर राहुल गांधी और इंडिया गठबंधन ने चुनाव आयोग के सामने यही बड़ा सवाल खड़ा किया है। विपक्ष का आरोप है कि इस प्रक्रिया में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जाने से पात्र नागरिकों के मतदान अधिकार प्रभावित होने का खतरा पैदा हुआ है। राहुल गांधी ने इस मुद्दे को केवल चुनावी गड़बड़ी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ा गंभीर सवाल बताया है। एक नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में इंडिया गठबंधन की रैली में राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए उनके इस्तीफे की मांग दोहराई। विपक्ष का कहना है कि चुनाव आयोग की जिम्मेदारी केवल मतदाता सूची में संशोधन करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि कोई पात्र नागरिक अपने मताधिकार से वंचित न हो। दूसरी तरफ भाजपा राहुल गांधी से उनके आरोपों के सबूत मांग रही है। इस राजनीतिक टकराव के बीच सबसे अहम सवाल अब भी अनुत्तरित है-मतदाता सूची से हटाए गए नामों का पूरा और पारदर्शी हिसाब जनता के सामने कब आएगा? आखिर कितने नाम हटाए गए? उनमें कितने मृत, स्थानांतरित, दोहरे या अपात्र मतदाता थे? कितने वास्तविक और पात्र मतदाताओं के नाम गलती से काटे गए? कितने लोगों को नोटिस दिया गया और कितनी आपत्तियों का निपटारा हुआ? इन सवालों का जवाब आंकड़ों और दस्तावेजों के साथ सार्वजनिक होना चाहिए। विपक्ष की मांग है कि विशेष गहन पुनरीक्षण के तहत नाम हटाने की प्रक्रिया की स्वतंत्र और पारदर्शी जांच कराई जाए तथा पात्र मतदाताओं को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर दिया जाए। चुनाव आयोग की ओर से इस प्रक्रिया को मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने का प्रयास बताया गया है। इसलिए विवाद का समाधान राजनीतिक आरोपों से नहीं, बल्कि सार्वजनिक आंकड़ों, शिकायतों के निष्पक्ष निपटारे और पारदर्शी जांच से निकलना चाहिए।

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