-अरुण कुमार गुप्ता
मतदाता सूची से लाखों नाम गायब हों और अपने ही वोट का अधिकार दोबारा हासिल करने के लिए नागरिकों को नए मतदाता की तरह आवेदन करना पड़े तो चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठना लाजिमी है। दिल्ली में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को सवालों के घेरे में ला दिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने करीब ४३ लाख ऐसे मतदाताओं के मामले पर सवाल उठाए, जिनके नाम पुराने पते पर उपलब्ध नहीं होने के कारण मसौदा मतदाता सूची में शामिल नहीं हो सके। अदालत ने पूछा कि जो व्यक्ति पहले से मतदाता था, उसे दोबारा पहली बार वोटर बनने वाला मानकर फॉर्म-६ भरने के लिए क्यों कहा जा रहा है? अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि फॉर्म-६, ७ और ८ निर्धारित नियमों के तहत हैं और आयोग अपनी ओर से उनमें बदलाव नहीं कर सकता। अदालत ने आयोग से कहा कि मतदाताओं के पीछे जाने के बजाय उन्हें खोजने और उनसे संपर्क करने की व्यवस्था बनाई जाए। जिन लोगों के नाम हटे हैं, उनकी सूची और नाम हटाने का कारण सार्वजनिक करने तथा संबंधित मतदाताओं को बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) तक पहुंचने की सुविधा देने का सुझाव भी दिया गया। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के अगले दिन चुनाव आयोग ने दिल्ली में दावे और आपत्तियां दाखिल करने की समयसीमा ३० अक्टूबर से बढ़ाकर २५ नवंबर कर दी। अंतिम मतदाता सूची अब २२ दिसंबर को प्रकाशित होगी। यह घटनाक्रम चुनाव आयोग के सामने एक बुनियादी सवाल खड़ा करता है। मतदाता सूची को शुद्ध करने की प्रक्रिया में कहीं वास्तविक मतदाता ही अपने अधिकार से वंचित तो नहीं हो रहे? आयोग का तर्क है कि नामों का सत्यापन जरूरी है, लेकिन सत्यापन के नाम पर किसी पात्र नागरिक के लिए मतदान का रास्ता कठिन नहीं होना चाहिए। लोकतंत्र में मतदाता की पहचान और उसका वोट दोनों सुरक्षित रहना जरूरी
जनमहाभियोग से डरी भाजपा सरकार?
चुनाव आयोग की निष्पक्षता और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर सवाल उठाने के लिए विपक्ष ने जनमहाभियोग कार्यक्रम की तैयारी की, लेकिन आयोजन स्थल को लेकर पैदा हुई मुश्किलों ने राजनीतिक विवाद को और गहरा कर दिया है। विपक्ष का आरोप है कि कार्यक्रम के लिए उसे जगह उपलब्ध कराने में अड़चनें आई। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या जनमहाभियोग की आवाज से भाजपा सरकार असहज है? कांग्रेस और विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के मुद्दे पर सरकार तथा आयोग को घेरने की रणनीति बनाई है। इसी सिलसिले में प्रस्तावित कार्यक्रम के लिए संविधान क्लब और तालकटोरा स्टेडियम जैसे स्थानों पर आयोजन की संभावनाएं तलाशी गई। लेकिन जगह को लेकर सहमति नहीं बनने के बाद अब कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास पर कार्यक्रम आयोजित करने की रणनीति सामने आई। विपक्ष का सवाल है कि जब राजनीतिक दलों को संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही पर चर्चा करने का अधिकार है, तो उनके कार्यक्रम के लिए जगह उपलब्ध कराने में मुश्किलें क्यों आ रही हैं? क्या प्रशासनिक नियम सभी राजनीतिक दलों पर समान रूप से लागू होते हैं या विरोध की आवाज उठाने वालों के सामने अलग-अलग बाधाएं खड़ी होती हैं? इस विवाद के बीच भाजपा सरकार की भूमिका को लेकर भी विपक्ष सवाल उठा रहा है। हालांकि आयोजन स्थलों से जुड़ी अड़चनों के पीछे सरकार के सीधे हस्तक्षेप का कोई प्रमाण सामने आना जरूरी है। लेकिन बड़ा सवाल अपनी जगह कायम है। चुनाव आयोग पर उठ रहे सवालों का जवाब पारदर्शिता और तथ्यों से दिया जाएगा या विपक्ष के कार्यक्रमों को लेकर पैदा होने वाले विवादों से राजनीतिक टकराव और बढ़ेगा? लोकतंत्र में असहमति को जगह देना सत्ता की जिम्मेदारी है। आखिर सवाल पूछने वालों को मंच मिलेगा या उन्हें मंच तलाशने के लिए भटकना पड़ेगा? है।
