अरुण कुमार गुप्ता
जिसके खिलाफ धरना प्रदर्शन करना है उसी से अनुमति चाहिए, जंतर-मंतर पहुंचना है तो बैरिकेड पार करने होंगे, मतदाता बनना है तो सूची में नाम तलाशना होगा और वोट डालने के बाद सवाल बरकरार रहता है। सवाल इसलिए बरकरार रहता है कि जिसको वोट दिया, उसको मिला कि नहीं और जिसको दिया वह जीतने के बाद बिक तो नहीं जाएगा या पार्टी तो नहीं बदल देगा। आज वर्तमान में देश की जनता इन सवालों से जूझ रही है। ऐसे में जनता पूछ रही है यह वैâसा लोकतंत्र। लोकतंत्र में आम नागरिक के हिस्से में अधिकार ज्यादा हैं या परेशानियां, यह सवाल अब टालना मुश्किल है। २ अक्टूबर को दिल्ली में चुनाव आयोग और एसआईआर से जुड़े मुद्दों को लेकर जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने अनुमति नहीं दी। सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की गई, कई रास्तों पर बैरिकेड लगाए गए और दिल्ली मेट्रो के ११ स्टेशनों के प्रवेश-निकास बंद किए गए। प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने की भी खबर सामने आई। जिस व्यवस्था के पैâसलों पर सवाल उठाना है, उसी व्यवस्था के प्रशासनिक तंत्र से विरोध की अनुमति मांगनी पड़े, तो लोकतांत्रिक अधिकार का व्यावहारिक रास्ता कितना सहज रह जाता है? जमीन पर मतदाता के सामने प्रक्रिया की चुनौती है। नाम खोजो, नहीं मिले तो दस्तावेज जुटाओ, दावा दाखिल करो और फिर इंतजार करो।आखिर देश की जनता के हिस्से में लोकतंत्र का कौन सा अधिकार बच रहा है, यह सबसे बड़ा सवाल है।
चुनाव आयोग के आईटी तंत्र में ‘घमासान’!
देश की चुनावी व्यवस्था का डिजिटल तंत्र कितना पारदर्शी है? चुनाव आयोग के भीतर फाइलों की निगरानी और अधिकारियों के अधिकारों को लेकर सामने आए पत्रों ने यह सवाल फिर खड़ा कर दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने जुलाई में वैâबिनेट सचिव को अलग-अलग पत्र लिखकर वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग की कार्यप्रणाली पर आपत्ति जताई थी। मामला आयोग के सूचना प्रौद्योगिकी विभाग की फाइलों की निगरानी व्यवस्था से जुड़ा था। रिपोर्ट के अनुसार, सूचना प्रौद्योगिकी महानिदेशक से जुड़ी फाइलें पहले एक उप चुनाव आयुक्त के स्तर पर निगरानी के लिए जाती थीं। इस व्यवस्था में बदलाव को लेकर दोनों चुनाव आयुक्तों ने आपत्ति दर्ज कराई। उनका कहना था कि इससे स्थापित निगरानी व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। मामला इतना गंभीर माना गया कि इसकी जानकारी कैबिनेट सचिव तक पहुंचाई गई। यहीं से सवाल उठता है। चुनाव आयोग के भीतर संवेदनशील आईटी व्यवस्था में अधिकार और निगरानी की सीमाएं आखिर किस प्रक्रिया से तय होती हैं? यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर मतदाता सूचियों, नामों के सत्यापन और डिजिटल चुनावी व्यवस्था पर देशभर में बहस चल रही है। ऐसे माहौल में चुनाव आयोग के आईटी तंत्र की आंतरिक निगरानी से जुड़ी कोई भी जानकारी स्वाभाविक रूप से सार्वजनिक महत्व हासिल करती है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह कहना उचित नहीं होगा कि इस घटनाक्रम से चुनावी डेटा में किसी तरह की गड़बड़ी हुई। चुनाव आयोग ने अपना स्पष्टीकरण दे दिया है, लेकिन दो आयुक्तों की आपत्ति और उसे लेकर सामने आया पत्राचार संस्थागत पारदर्शिता पर चर्चा का आधार जरूर बनता है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है। आईटी विभाग की संवेदनशील फाइलों की निगरानी बदलने का प्रस्ताव क्यों आया, किस प्रक्रिया के तहत आया और उस पर दो चुनाव आयुक्तों को आपत्ति क्यों हुई?
