-दो साल में हजारों पेड़ों और ४५ हजार मैंग्रोव्ज की बलि
-कंक्रीट के जंगल के लिए उजड़ रही हरियाली
जेदवी / मुंबई
मुंबई में विकास परियोजनाओं की रफ्तार के साथ शहर की हरियाली लगातार उजड़ती जा रही है। पिछले दो वर्षों में मेट्रो, कोस्टल रोड, गोरेगांव-मुलुंड लिंक रोड (जीएमएलआर), बुलेट ट्रेन और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के कारण हजारों पेड़ों और करीब ४५ हजार मैंग्रोव्जों पर आरी चल चुकी है। अब बृहन्मुंबई महानगरपालिका के वृक्ष प्राधिकरण ने १९ जून को तीन नई परियोजनाओं के लिए १,०८० पेड़ों को हटाने की मंजूरी देकर एक बार फिर पर्यावरण को लेकर गंभीर सवाल उपस्थित कर दिए हैं।
सबसे बड़ा असर ३,३१४ करोड़ रुपए की लागत वाले १३.९ किलोमीटर लंबे एलिवेटेड ईस्टर्न प्रâीवे एक्सटेंशन पर पड़ेगा। घाटकोपर के छेड़ा नगर से ठाणे के आनंद नगर तक बनने वाले इस छह लेन कॉरिडोर के लिए ६२१ पेड़ प्रभावित होंगे। इनमें २१८ पेड़ों को काटा जाएगा, जबकि ४०३ पेड़ों को दूसरी जगह स्थानांतरित किया जाएगा। परियोजना पूरी होने के बाद दक्षिण मुंबई से ठाणे का सफर २५ से ३० मिनट में पूरा करने का दावा किया जा रहा है, लेकिन पर्यावरणविदों का कहना है कि हरियाली की कीमत पर विकास शहर के भविष्य के लिए खतरा बनता जा रहा है।
विरोध के बावजूद मिली मंजूरी
वृक्ष प्राधिकरण की बैठक में शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के सदस्यों ने पेड़ों की कटाई का विरोध करते हुए आधुनिक तकनीकों से शत-प्रतिशत प्रत्यारोपण की मांग की। हालांकि, सत्ता पक्ष और संबंधित विभागों ने प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। एमएमआरडीए का दावा है कि डिजाइन में बदलाव कर १२७ पिंक ट्रंपेट पेड़ों को बचा लिया गया है, लेकिन पर्यावरणविदों का कहना है कि इससे बड़े नुकसान की भरपाई नहीं हो सकती।
बढ़ रहा है पर्यावरणीय संकट
विशेषज्ञों के अनुसार पेड़ों और मैंग्रोव्जों की लगातार कटाई के कारण मुंबई में ‘अर्बन हीट आइलैंड’ प्रभाव बढ़ रहा है। तापमान में वृद्धि, हवा की गुणवत्ता में गिरावट और मानसून के दौरान जलभराव का खतरा लगातार गंभीर होता जा रहा है। समुद्री किनारों की प्राकृतिक सुरक्षा माने जाने वाले मैंग्रोव्जों का नुकसान भविष्य में बाढ़ के खतरे को और बढ़ा सकता है।
प्रत्यारोपण के दावों पर सवाल
प्रशासन पेड़ों के प्रत्यारोपण को समाधान बता रहा है, लेकिन पर्यावरणविदों का दावा है कि स्थानांतरित किए गए पेड़ों में बहुत कम पेड़ ही लंबे समय तक जीवित रह पाते हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने की जिम्मेदारी आखिर कौन निभाएगा?
