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संपादकीय : सूखे मेवे की बहार!.. किसानों का अकाल!

महाराष्ट्र की सरकार शाही ठाट-बाट से जी रही है, लेकिन आधी से ज्यादा जनता अकाल की छाया में है और महाराष्ट्र में डर, भूख, प्यास का शैतानी राज आने वाला है। मानसून की वापसी का सफर शुरू हो चुका है और अकाल के गिद्ध पीछे छोड़ते हुए मानसून लौट रहा है। मराठवाड़ा, उत्तर महाराष्ट्र, विदर्भ का किसान बेहाल हो चुका है। इस अकाल को लेकर फडणवीस-मिंधे की सरकार गंभीर है क्या? राज्य के कृषि मंत्री दत्तामामा भरणे सूखे अकाल का मुआयना करने के लिए मराठवाड़ा दौरे पर गए। नांदेड़ में अकालग्रस्त दौरा करने से पहले विश्राम गृह में हुई प्रशासनिक बैठक में मंत्री, विधायक, सांसद मंडली काजू-बादाम, सूखे मेवे पर हाथ साफ कर रही थी, ऐसी तस्वीरें प्रकाशित हुई हैं। किसान सूखे अकाल के कारण चीख-पुकार कर रहा है और सरकार सूखा मेवा खाकर डकार ले रही है।किसानों के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम है। मिंधे गुट के सांसद बंडू जाधव ने अकाल में काजू-बादाम की इस खुराक का खुलेआम समर्थन किया। ये सांसद कहते हैं, ‘काजू-बादाम का इतना बवंडर क्यों मचाते हो भाई? मुझे कड़ाके की भूख लगी थी इसलिए काजू-बादाम खाए। हजार-पांच सौ रुपए के काजू-बादाम पर इतना हंगामा क्यों खड़ा करना?’ सांसद की यह बात अमानवीय है। ५०-५० करोड़ रुपए खाकर डकार लेने वालों की भूख मिटी नहीं है। और फिर अकाल की बैठक में भूख लगी इसलिए
काजू-बादाम खाने
हैं, यह कैसी रीति है? मुख्यमंत्री इस पर कहते हैं, ‘ऐसे काजू-बादाम खाना ठीक नहीं है। प्रशासन को संवेदनशील रहना चाहिए। हर चीज की राजनीति करने की विपक्ष को आदत है।’ मुख्यमंत्री फडणवीस से ऐसी असंवेदनशीलता की उम्मीद नहीं थी। काजू-बादाम का ठीकरा उन्होंने प्रशासन पर फोड़ दिया। महाराष्ट्र राज्य के प्रशासन के मुखिया आप ही हैं। अधिकारियों ने लाख काजू-बादाम, बिरयानी की थाली सामने लाकर रख दी होगी, लेकिन खाने वालों को शर्म आनी चाहिए, मगर बेशर्मी के खंभों पर जो सरकार खड़ी है उससे अलग क्या उम्मीद करेंगे? राज्य में खड़ी फसलों का भारी नुकसान हुआ है। सोयाबीन जैसी फसलें जल गई हैं। किसान खेत की मेड़ पर बैठकर रो रहा है। मवेशियों का चारा, पीने का पानी, बच्चों की शिक्षा, बेटियों की शादियां, बुझते हुए चूल्हों की भयानक तस्वीर महाराष्ट्र देख रहा है। मगर मुख्यमंत्री कह रहे हैं , ‘मंत्रिमंडल की बैठक में इस गंभीर स्थिति पर गहन चर्चा हुई है। सभी जिलों की प्राथमिक समीक्षा पूरी होगी। उसके बाद तुरंत फसलों के आधिकारिक पंचनामे करके किसानों को तुरंत आर्थिक मदद दी जाएगी।’ मुख्यमंत्री की बातों पर भरोसा वैâसे करें? अकाल में आर्थिक मदद को लेकर भी वे राजनीति नहीं करेंगे, इसकी क्या गारंटी है? क्योंकि विकास निधि के बंटवारे को लेकर उनकी ऐसी ही राजनीति जारी है। कल उसी तरह से जिस निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा का विधायक है, वहां के किसानों को ही अकाल राहत व मदद दी जाएगी और विपक्षी विधायकों के क्षेत्र में मदद नहीं मिलेगी। सरकार इस मौके पर
इस तरह के हरकतें
न करे इतनी ही उम्मीद है। कुछ महीने पहले ही राज्य सरकार ने संपूर्ण कर्जमाफी की घोषणा की, लेकिन उसका क्रियान्वयन नहीं हुआ है। अब तक कर्जमाफी की तीन सूचियां प्रकाशित होने की बात कही जाती है, लेकिन ‘कर्जमाफ हुआ किसान दिखाओ और पांच हजार रुपए का इनाम पाओ’ ऐसी घोषणा करने जैसी स्थिति गांव-गांव में दिखती है। राज्य सरकार को किसानों पर आए संकटों की चिंता नहीं है। वह राजनीति और होड़ में उलझकर रह गई है। सोयाबीन, कपास, बाजरा, मक्का, अरहर, मूंग और उड़द ये फसलें किसानों के हाथ से निकल गई हैं। अकाल के मुद्दे पर सरकार को विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर चर्चा करानी चाहिए। राजनीति को किनारे रखकर अकाल राहत के लिए सर्वदलीय ‘टास्क फोर्स’ का गठन करना चाहिए। शरद पवार के कहे अनुसार, बिना किसी औपचारिक मानदंड का इंतजार किए राज्य में अकाल घोषित करना चाहिए। किसानों को प्रति हेक्टेयर ५० हजार की मदद, पूरी तरह से एकमुश्त कर्जमाफी, विद्यार्थियों की शैक्षणिक फीस माफी और चारा छावनियां शुरू करके किसानों पर आया संकट हल्का करना चाहिए। महाराष्ट्र में अकाल की स्थिति गंभीर है और दिन-ब-दिन वह और अधिक गंभीर होती जाएगी। किसान अकाल में झुलस रहा है, ऐसे में ठंडे सरकारी विश्राम गृहों में ‘सूखा मेवा’ खाने वालों को महाराष्ट्र के अकाल की गंभीरता समझ नहीं आएगी। मुख्यमंत्री सिर्फ बोलते हैं। करते कुछ नहीं। प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर तेल जलाकर हजारों दिए जलाए गए, लेकिन अकाल का साया क्या उससे दूर हो जाएगा? अकाल गंभीर है, लेकिन सूखे मेवे की बहार बहुत ही शर्मनाक है।

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