अयोध्या के राम मंदिर की लूट पर नई ‘रामायण’ घटित होने के बाद कुछ लोगों की नींद खुली है। उनमें राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा भी शामिल हैं। मिश्रा ने अब कहा है, ‘अयोध्या के राम मंदिर में दान गबन का मामला एक कलंक है। इससे हर कोई बेहद अपमानित महसूस कर रहा है।’ नृपेंद्र मिश्रा मोदी सरकार के केंद्रीय वैâबिनेट सचिव थे। वे उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव भी रहे चुके हैं। मुलायम सिंह के मुख्यमंत्री रहते हुए अयोध्या में कारसेवकों पर जो गोलीबारी हुई थी, वह सरकार यानी मुलायम सिंह का कोई आदेश नहीं था, इसकी स्वीकारोक्ति मिश्रा ने हाल ही में दी और भाजपा को भारी असमंजस में डाल दिया। अब मिश्रा ने राम मंदिर दान गबन के मुद्दे पर ‘कलंकित’ होने को लेकर अपनी बेबाक राय व्यक्त की है। राम मंदिर की इस लूट का दायरा बहुत बड़ा है और पिछले १२-१३ वर्षों में राम मंदिर परियोजना के नाम पर १४ हजार करोड़ रुपए जुटाए गए। इसका हिसाब कोई नहीं देता। मंदिर निर्माण के बाद जिनके हाथों में मंदिर की चाबियां थीं, उन्हीं के लोगों ने राम की दान पेटियों को लूट लिया। लूट का यह आंकड़ा कम से कम ५०० करोड़ का है। अगर राम को अर्पित सोना, चांदी, जवाहरात जैसी कई मूल्यवान वस्तुएं चोरी हो गई हैं तो सबसे पहले राम मंदिर ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष और ट्रस्ट मंडल को जिम्मेदार ठहराते हुए उनके खिलाफ मामले दर्ज होने चाहिए थे, लेकिन नृपेंद्र मिश्रा ने सिर्फ खेद जताया। ‘कलंकित जैसा महसूस हो रहा है’ ऐसी व्यक्तिगत भावनाएं व्यक्त कीं। राम मंदिर की लूट के कारण पूरे हिंदू समाज की
छवि कलंकित
हुई है। हिंदुओं में अपमानित होने की भावना है। देश में ऐसा माहौल बन गया है, जैसे अयोध्या में अब ‘राम’ बचे ही नहीं हैं। राम मंदिर की लूट का भंडाफोड़ होने के बाद अयोध्या आनेवाले भक्तों की संख्या में भारी गिरावट आई है। ७५ प्रतिशत श्रद्धालुओं का आना कम हो गया है। दर्शन के लिए जहां पहले चार-चार घंटे कतार में खड़ा रहना पड़ता था, अब आधे-पौने घंटे में प्रभु राम के दर्शन हो जाते हैं। होटल व्यवसाय पर इसकी भारी मार पड़ी है। बमुश्किल २५ प्रतिशत कमरे ही भर पा रहे हैं। माला-प्रसाद बेचने वाले रेहड़ी-पटरी वाले रोज चार-पांच हजार रुपए कमा लेते थे, अब हजार रुपए का भी गल्ला नहीं हो पाता। ई-रिक्शा चलानेवालों का धंधा भी चौपट हो गया है। रेस्टोरेंट की भीड़ कम हो गई है। मंदिर में हुई इस चोरी की मार अयोध्या के छोटे व्यापारियों पर भी पड़ी है। अयोध्या के आस-पास और सौ नए होटल खड़े हो रहे हैं, आज की स्थिति ने उन निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। अयोध्या धार्मिक पर्यटन का एक बड़ा केंद्र बन चुका था, लेकिन इस ‘चोरी’ के मामले ने धार्मिक पर्यटन के महत्व को ही खत्म कर दिया। अगर राम मंदिर में ही चोरों की भरमार हो गई है तो क्या प्रभु श्रीराम भी वहां सुरक्षित हैं? चारों तरफ चोरों का राज आने से ‘राम’ फिर से दंडकारण्य तो नहीं चले गए? ऐसी शंका से देशभर के रामभक्त परेशान हैं। इसी वजह से अयोध्या की भीड़ छंट गई है। नृपेंद्र मिश्रा ने अब खेद व्यक्त किया है, लेकिन अयोध्या के मुख्य चोरों को संरक्षण देकर श्रीमान मिश्रा राम को बार-बार कलंकित कर रहे हैं। राम मंदिर की पूरी कमान भाजपा समर्थित हिंदुत्ववादी संस्थाओं के पास ही थी। मंदिर की
चाबियां अपनी कमर में खोंसकर ही
ये लोग अकड़ में घूम रहे थे। जब मंदिर बना, तो उसका श्रेय नरेंद्र मोदी को ही देने की होड़ मच गई थी। फिर मंदिर के चोरी मामले की वजह से प्रधानमंत्री मोदी को भी कलंकित और अपमानित महसूस क्यों नहीं होना चाहिए? सवाल सिर्फ दान पेटी और चंदे की चोरी का नहीं है। भाजपा और संघ परिवार की साख पर ही बट्टा लग गया है। जिन लोगों पर लूटपाट का आरोप है, वे सभी खुलेआम मंदिर परिसर में घूम रहे हैं। पुलिस उन्हें सामान्य पूछताछ के लिए भी बुलाने को तैयार नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के भीतर का हिंदू भी इस ‘चोरी’ कांड के बाद उबलकर बाहर नहीं आया। जनता को उम्मीद थी कि राम मंदिर दान पेटी लूट मामले पर प्रधानमंत्री मोदी अपनी ‘मन की बात’ खोलेंगे, श्रीराम से माफी मांगेंगे, मंदिर के लिए बलिदान देने वाले कारसेवकों की स्मृति को नमन कर खेद व्यक्त करेंगे; लेकिन इसमें से कुछ भी नहीं हुआ और अब नृपेंद्र मिश्रा ने खेद की फुसफुसी छोड़कर रामभक्तों का एक और अपमान किया है। राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा समारोह का पूरा श्रेय प्रधानमंत्री मोदी ने लिया। दुनियाभर की हस्तियों को उस दौरान अयोध्या में इकट्ठा किया गया। उस दिन मोदी मानो विष्णु के अवतार हों, इस अंदाज में घूम रहे थे। उस भक्तिमय माहौल में भी उनके चेहरे का ढोंग और अहंकार छिपा नहीं था। उसी अहंकार का अजीर्ण हुआ और चोर राम मंदिर के गर्भगृह में घुसकर लूट कर ले गए। अब जांच, गिरफ्तारियां आदि सब एक तमाशा हैं। नृपेंद्र मिश्रा का ‘खेद’ इसी तमाशे का हिस्सा है।
