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संपादकीय : शक्तिशाली देशों की सूची… फूटा गुब्बारा!

भारतीय जनता पार्टी लगातार यह शेखी बघारती रहती है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘विश्व गुरु’ हैं और उनके नेतृत्व में भारत वैश्विक महाशक्ति बनने की राह पर अग्रसर है। हालांकि, अब एक ऐसी खबर सामने आई है जो इन मोदीभक्ति में तल्लीन चारणों के मुंह पर ताला जड़ देगी। भारत दुनिया के दस सबसे शक्तिशाली देशों की सूची से बाहर फेंक दिया गया है। विश्व पर प्रभुत्व रखनेवाले देशों की इस रैंकिंग में हिंदुस्थान बारहवें स्थान पर खिसक गया है। ‘वर्ल्ड पॉपुलेशन रिव्यू’ ने रविवार को नए साल २०२६ के लिए शक्तिशाली देशों की रैंकिंग की घोषणा की। अंतर्राष्ट्रीय रैंकिंग में यह गिरावट भारत के लिए एक बड़ा झटका कहा जा सकता है। ‘विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था’ और ‘विश्व की चौथी सबसे बड़ी सैन्य शक्ति’ की विरुदावली के अभिमान में मगन भारत अचानक शक्तिशाली देशों की सूची में पिछड़ गया है। हमेशा की तरह, अमेरिका विश्व के सबसे शक्तिशाली देश के रूप में शीर्ष पर बना हुआ है। चीन और रूस क्रमश: दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं। इनके बाद ब्रिटेन, जर्मनी, दक्षिण कोरिया, प्रâांस, जापान, सऊदी अरब और इजरायल का स्थान है। सरकार ने हाल ही में
अपनी पीठ थप-थपाते हुए
घोषणा की थी कि भारत जापान को पीछे छोड़ते हुए विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। इतना ही नहीं, सरकार ने एक विशेष बयान जारी कर कहा था कि अगर आर्थिक विकास की मौजूदा रफ्तार जारी रही तो हम २०३० तक जर्मनी को भी पीछे छोड़कर दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएंगे। अगर यह सब सच है तो अचानक किस मक्खी के छींकने से हम दस सबसे शक्तिशाली देशों की सूची से बाहर क्यों हो गए? सरकार को अब इस बारे में भी बयान जारी करना चाहिए। दक्षिण कोरिया, सऊदी अरब, इजरायल जैसे अपेक्षाकृत छोटे देश शीर्ष दस में हैं और हम १२वें नंबर पर! जब एक ‘विश्व गुरु’ देश का नेतृत्व कर रहा है तो ऐसा क्यों हुआ? देशवासियों को इसका जवाब मिलना चाहिए। भारत ‘वर्ल्ड पॉपुलेशन रिव्यू’ द्वारा शक्तिशाली देशों की रैंकिंग के लिए इस्तेमाल किए जानेवाले पांच प्रमुख मानदंडों में कहीं तो पीछे रह गया, यही कारण है कि हम ‘टॉप टेन’ देशों में जगह नहीं बना पाए। पहला मानदंड यह है कि वैश्विक व्यापार और राजनीति में किसी देश की बात कितनी मानी जाती है, उस देश का विश्व पर कितना राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव है। यह रैंकिंग पांच प्रमुख मानदंडों पर आधारित है: ‘नाटो’ जैसे अंतर्राष्ट्रीय सैन्य गठबंधनों में भागीदारी, उन्नत प्रौद्योगिकी में अनुसंधान का स्तर, विश्व मंच पर देश की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा और नेतृत्व करने की क्षमता और उस देश की आंतरिक शासन प्रणाली की स्थिरता। इन सभी मोर्चों और मानदंडों पर देश के प्रदर्शन की जांच हुई होगी और उन सभी मामलों में आनंद ही आनंद पाए जाने के बाद ही शायद दस शक्तिशाली देशों की
रैंकिंग से नाम गायब
हुआ होगा। केंद्र सरकार और उसके समर्थक, जो अक्सर छोटी-छोटी बातों का श्रेय लेते हैं, तारीफों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं, इस गिरावट के बारे में क्या कहेंगे? भक्त समुदाय, जो ओमान, जॉर्डन, इथियोपिया, घाना, रवांडा आदि जैसे छोटे देशों की यात्राओं के दौरान मिले स्वागत और वहां की सरकारों द्वारा दिए गए सम्मानों के बारे में लिखकर प्रधानमंत्री मोदी को ‘विश्व गुरु’ घोषित करने की खूब तारीफ करता था, अब मुंह में दही जमाए बैठा है। भले ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने प्रधानमंत्री और मोदी के शब्दों में, १४ करोड़ भारतीयों का प्रतिदिन अपमान कर रहे हैं, फिर भी सरकार के समर्थक अपमान का घूंट पीते हुए चुप हैं। हिंदुस्थान की तरफ देखते हुए बांग्लादेश और नेपाल जैसे देशों की बोलती बंद हो जाती थी। आज वे आंख फाड़ कर देख रहे हैं कि हिंदुस्थान दुनिया के दस सबसे शक्तिशाली देशों की सूची से बाहर हो गया है, अब सरकारी प्रवक्ता और सोशल मीडिया के चारण भी मौन धारण किए बैठे हैं। चाहे हम भारत ‘विश्व गुरु’ और दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था कैसे बना है इस बात का जितना ढिंढोरा पीट कर अपनी पीठ थपथपा लें, लेकिन आज दुनिया के दस सबसे शक्तिशाली देशों की सूची से भारत का नाम गायब हो चुका है। खोखले दावों का गुब्बारा फूट चुका है। सरकार को अब देश को यह बताना चाहिए कि भारत पावरफुल देशों की सूची से क्यों बाहर हो गया है!

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