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संपादकीय : एकता चिरायु हो!

महाराष्ट्र की धरती पर आज मुंबई नगरी में मराठी एकता का भव्य विजयोत्सव मनाया जा रहा है। इन दिनों मराठी जीवन में विजय और उल्लास के क्षण कम ही आते हैं। जब से सूरत ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन दिल्ली में आया है, तब से महाराष्ट्र पर चारों ओर से प्रहार हो रहे हैं। मौजूदा भाजपाई दिल्लीश्वर महाराष्ट्र और मराठी लोगों की घेराबंदी करने और उन्हें लाचार और आत्मसमर्पण करने का एक भी मौका नहीं छोड़ रहे हैं। ऐसे हालात में, मराठी लोगों ने दिल्लीश्वर द्वारा थोपी गई त्रिभाषाई अनिवार्यता को पलटकर मराठी के तौर पर विजय का यलगार किया है। तीसरी भाषा को मराठी भाषा की पूंछ के रूप में जोड़ने का प्रयास सभी की एकता से विफल हो गया। इसके लिए महाराष्ट्र के सभी राजनीतिक दल और नेता एक साथ आए। उस एकता में तेज, शक्ति और विचार से जो प्रखर होकर चमक उठे, वे हैं ‘ठाकरे’ बंधु! उद्धव और राज ठाकरे ५ जुलाई को त्रिभाषाई अनिवार्यता विरोधी मोर्चे में अपने सैनिकों के साथ एकजुट हो रहे हैं और इस डर से कि उस दिन मुंबई की सड़कों पर अस्सल मराठी राडा होगा, सरकार ने घोषणा कर दी कि वह महाराष्ट्र पर थोपे गए त्रिभाषा सूत्र की अनिवार्यता को रद्द कर रही है। मराठी लोगों के एकजुट होने से क्या चमत्कार होते हैं, इसका यह एक बेहतरीन नमूना है। इस अवसर पर वर्ली के भव्य हॉल में मराठीजनों की जीत का जश्न मनाया जा रहा है। सच तो यह है कि कोई भी बड़ा हॉल ऐसे मराठी विजयी समारोहों को समायोजित करने में सक्षम नहीं होगा। इसके लिए मराठी लोगों के असली शिवतीर्थ की आवश्यकता थी। चाहे लड़ाई संयुक्त महाराष्ट्र के लिए हो, महाराष्ट्र की स्थापना के लिए हो या शिवसेना की स्थापना के लिए, मराठीजनों ने हर विजय समारोह शिवतीर्थ में मनाया और अपनी
विराट शक्ति का दर्शन
कराया, लेकिन मौजूदा ‘मिंधे’-फडणवीस सरकार मराठी विजय उत्सव में सहयोग करने के लिए तैयार नहीं है इसलिए आज का विजय समारोह शिवतीर्थ में नहीं हो सकता। बावजूद, आज की विजय रैली से मराठी लोगों का उत्साह फूट पड़ा है। ऐसा लगता है जैसे शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे स्वर्ग से अपने मराठीजनों से ‘चलो वर्ली’ की अपील कर रहे हैं। आज मराठीजनों की स्थिति दुविधा में फंसे बाघ की तरह हो गई है। मराठी जनता भले ही महाराष्ट्र राज्य में है, लेकिन वास्तविकता यह है कि उसका कोई (त्राता-पिता) रक्षक – पिता नहीं है। सतह पर तो सब कुछ हमारा ही लगता है, लेकिन अगर हम थोड़ा गहराई से देखें तो पाते हैं कि हमारे अधिकारों और न्याय की परवाह करनेवाला कोई नहीं है। महाराष्ट्र और मराठी माणुष के साथ अन्याय, अपमान या अवमानना का कोई भी सवाल ‘राष्ट्रीय’ संदर्भ के बहाने तुरंत दबा दिया जाता है। देश को आजादी मिलने के बाद से महाराष्ट्र की एक भी मांग शहादत और रक्ताभिषेक के बिना पूरी नहीं हुई है। हुक्मरान कोई भी हों, उनकी नीति मुंबई को अंधाधुंध लूटने की रही है। केंद्रीय दिल्ली वालों की महाराष्ट्र के प्रति ईर्ष्या एक सर्वविदित ऐतिहासिक तथ्य है। महाराष्ट्र से बड़े-बड़े नेता दिल्ली गए, लेकिन एक चिंतामणराव देशमुख को छोड़कर कोई भी इस नफरत और घृणा के डंक को तोड़ या कुंद नहीं कर सका। जब हिंदी अनिवार्यता का हथौड़ा महाराष्ट्र पर पड़ा तो दिल्ली में कितने केंद्रीय मंत्रियों ने इस अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई? कितने लोगों ने विरोध किया? इसका
जवाब शून्य ही
मानना होगा। माहौल गरमा गया, असहनीय हो गया, अहान-पुकार के बावजूद कोई मदद के लिए आगे नहीं आया तो कहीं न कहीं विस्फोट होना ही था। साक्षात ब्रह्मा भी इसे टाल नहीं सकते थे और उसमें शिवाजी महाराज का महाराष्ट्र और मराठी लोग स्वभाव से ही विद्रोही हैं। जब तक यह विद्रोही तेवर और मराठी का अभिमान हमारी रगों में बह रहा है, तब तक किसी में महाराष्ट्र की ओर टेढ़ी नजर से देखने की हिम्मत नहीं है। मराठी भाषा और पहचान को खतरा हमारे अपने लोगों से है। मराठी के दुश्मन और हत्यारे हमारे ही घरों में हैं। शाह सेना के नेता एकनाथ शिंदे (मिंधे) ने पुणे में एक कार्यक्रम में अमित शाह के सामने ‘जय गुजरात’ का नारा लगाकर मराठी बाने की ऐसी की तैसी कर डाली। यह महाराष्ट्र के लिए खतरे की घंटी है। अब तक किसी भी मंत्री ने महाराष्ट्र में रहते हुए खुलेआम ‘जय गुजरात’ का नारा नहीं दिया था। वो इस शाह सेनावाले ने दिया। केडिया नामक एक व्यापारी महाराष्ट्र को चुनौती देते हुए कहता है, ‘मैं ३० साल से महाराष्ट्र में रह रहा हूं, लेकिन मैं मराठी नहीं बोलूंगा।’ इन लोगों में यह हिम्मत बढ़ी है, क्योंकि अमित शाह ने मराठी लोगों की मजबूत एकता को तोड़ दिया है। मराठी एकता को तोड़कर उन्होंने शिंदे जैसे लोगों को कठपुतली बना दिया है। पैसे की ताकत से लोगों को (स्वाभिमान सहित) खरीदने का गुजराती फॉर्मूला महाराष्ट्र में जहर की तरह पैâल चुका है। अगर इसे रोकना है तो मराठी लोगों को आज ‘हर हर महादेव’, ‘जय भवानी, जय शिवाजी’ का नारा लगाते हुए वर्ली की ओर कूच करना होगा। महाराष्ट्र मरा नहीं है और मराठी एकता नहीं टूटेगी, यह संदेश देने वाला आज का दिन मराठी अस्मिता के लिए ऐतिहासिक हो!

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