मुख्यपृष्ठनए समाचारसंपादकीय : ‘राडा' तो होगा ही!

संपादकीय : ‘राडा’ तो होगा ही!

विकासवाद के सिद्धांत के अनुसार बंदर इंसान बने, लेकिन कल महाराष्ट्र विधान भवन में जो हुआ उसे देखने के बाद जनप्रतिनिधि भी बंदर बन गए हैं और इन बंदरों ने महाराष्ट्र की प्रतिष्ठा को धूमिल किया है। जिसे हम विधायिका कहते हैं उस विधायिका के दरवाजे पर विधायकों द्वारा पाली गईं दो टोलियां भिड़ गईं। वे विधायिका के द्वार पर एक-दूसरे पर ऐसे हमला करते दिखे जैसे सड़क पर कोई जानलेवा लड़ाई हो रही हो। महाराष्ट्र की महान संस्कृति को विकृत करनेवाले ये सभी टोल भैरव भारतीय जनता पार्टी में भर्ती किए गए हैं और मुख्यमंत्री फडणवीस इनका नेतृत्व कर रहे हैं। यह आश्चर्य की बात है कि ये सभी लोग फिर से राज्य की संस्कृति और नैतिकता पर भाषण झाड़ते हैं। यह युद्ध भाजपा विधायक पडलकर और राष्ट्रवादी विधायक जीतेंद्र आव्हाड की टोलियों के बीच छिड़ा। जब विधानसभा सत्र चल रहा था तो बस सदन की सीढ़ियों पर हथियार निकालना बाकी था। फडणवीस सामाजिक विघटनवादियों को रोकने और अर्बन नक्सलवादियों को गिरफ्तार करने के लिए ‘पब्लिक सेफ्टी एक्ट’ लाए, लेकिन उनकी अपनी ही पार्टी में अर्बन नक्सलवादियों के नमूने मौजूद हैं और ऐसे अनेक नमूने विधानसभा और विधान परिषद में लाकर फडणवीस खुद की ही इज्जत तार-तार कर रहे हैं। जब से भाजपा ने महाराष्ट्र का राजनीतिक नेतृत्व संभाला है, विधान मंडल का कामकाज घटिया स्तर का हो गया है। चुने जाने की क्षमता रखनेवाले गुंडों को भी उम्मीदवारी देने का यह नतीजा है। इसी वजह से हाल ही में जनप्रतिनिधियों की सोच में कमी आई है। विधायकों में किसी भी विषय का अध्ययन करने की प्रवृत्ति कम होती जा रही है इसलिए
विधान सभागृह का वह स्वरूप
जहां पहले गहन और विद्वतापूर्ण भाषण होते थे अब खत्म-सा हो गया है, वहां एक-दूसरे को गाली देने, एक-दूसरे को कुचलने और शोर मचाकर काम रोकने की प्रवृत्ति बहुत बढ़ गई है। ये बातें स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा के संरक्षण की दृष्टि से अत्यंत हानिकारक हैं। विधायिका में विचार प्रक्रिया समाप्त हो गई है और चमचे तथा कलहप्रिय लोगों का प्रभुत्व सभागृह और बाहर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। कल विधान भवन में जो हुआ, वह इसी का परिणाम है। संसदीय लोकतंत्र में विधानसभा एक पवित्र मंदिर है, जो राज्य में लोकतंत्र की रक्षा और पूजा करती है, लेकिन हाल के दिनों में इस मंदिर की पवित्रता को कलंकित करनेवाली घटनाओं पर किसी को खेद नहीं है। महाराष्ट्र विधानसभा को न केवल स्वर्गीय बालासाहेब खेर, स्वर्गीय दादासाहेब मावलंकर, बालासाहेब भारदे जैसे अपने पूर्ववर्तियों द्वारा बनाई गई महान परंपराओं का संरक्षण करना चाहिए, बल्कि उसमें नई और उज्ज्वल परंपराओं को जोड़कर अपनी छवि को भी उज्ज्वल करना चाहिए। हालांकि, ऐसा होता हुआ नहीं दिख रहा है। भाजपा ने तो कई ऐसे लोगों को भी संसदीय कार्यों में पदों पर नियुक्त कर दिया है, जिनका स्थान पुलिस हिरासत या जेल में होना चाहिए। जब ऐसे लोग और उनकी टोलियां विधान भवन में घुसेंगे तो ‘राडे’ तो होंगे ही। पडलकर, खोत, लाड, शिरसाट, गायकवाड़, गोगावले जैसे नमूने रोज विधानसभा की इज्जत चौराहे पर ले आते हैं और हमारे मुख्यमंत्री फडणवीस, जो गृह मंत्री हैं, महाभारत के धर्मराज की तरह, मानो कि जुए की चौसर बिछाए विधानमंडल के मुख्य सिंहासन पर बैठे हैं और
राजनीतिक द्यूत के पासे
फेंक रहे हैं। महाराष्ट्र के निर्माण में योगदान देनेवाले शरद पवार और ‘ठाकरे’ परिवार पर फडणवीस द्वारा पोषित लोगों द्वारा बोली जानेवाली गाली-गलौज की भाषा महाराष्ट्र की संस्कृति नहीं है। ये लोग इसलिए बोलते हैं, क्योंकि उन्हें फडणवीस और अन्य लोगों का समर्थन प्राप्त है। उनमें कोई डर नहीं बचा है। यही गिरोह के प्रमुख, जो विधायक बन गए हैं, गुंडों के साथ विधान भवन में आते हैं और हाथापाई करते हैं। पिछले १० वर्षों में लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा की धज्जियां उड़ी हैं। जनप्रतिनिधियों का चरित्र धुले हुए चावल की तरह साफ और उनका व्यवहार सूर्य के प्रकाश की तरह उज्ज्वल होना चाहिए। उन पर ”Caesar’s wife should be above suspicious’ सीजर की पत्नी को संदेह से परे’ जैसी बड़ी जिम्मेदारी है। महाराष्ट्र के पहले मुख्यमंत्री स्वर्गीय बालासाहेब खेर कहा करते थे, ‘अगर कोई मुझे मूर्ख कहे तो ठीक है, लेकिन अगर कोई मुझ पर झूठ का आरोप लगाए तो मुझे अधिक दुख होगा।’ बालासाहेब खेर, यशवंतराव चव्हाण, वसंतराव नाईक, वसंतदादा पाटील के चरित्र और निष्पक्षता की तुलना में देवेंद्र फडणवीस वास्तव में कहां खड़े हैं? वह कचरे पर भौंकनेवाले कुत्तों और गुंडों के गिरोह इकट्ठा करके शासन कर रहे हैं। यदि लोकतंत्र के रक्षक स्वयं इसकी जड़ों को नुकसान पहुंचाने लगेंगे तो इसकी रक्षा कौन करेगा? भाजपा और दिल्ली में उसके ‘आका’ मंडली ने महाराष्ट्र में ऐसी स्थिति पैदा कर दी है, जहां दुर्योधन बौराएंगे और लोकतांत्रिक और संसदीय परंपराओं की हत्या करेंगे। यह महाराष्ट्र की राजनीतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक विरासत को नष्ट करने के लिए किया जा रहा है। महाराष्ट्र के साथ-साथ मुख्यमंत्री फडणवीस अपना भी अवमूल्यन करवा रहे हैं। मुख्यमंत्री आते-जाते रहेंगे। भाजपा के ऐरे-गैरे महाराष्ट्र की नींव ही उखाड़ फेंकने पर तुले हैं।

अन्य समाचार