तमिलनाडु के मुख्यमंत्री थलपति विजय द्वारा ताबड़तोड़ पैâसले लेने और उनके भक्तों द्वारा उनकी जमकर तारीफ करने का सिलसिला शुरू हो चुका है। उनके समर्थकों की ओर से ऐसी खबरें पैâलाई जा रही हैं कि थलपति ने यह कर दिया और वह कर दिया। थलपति और उन्हें मतदान करनेवाले एक बड़े वर्ग को कुछ समय के लिए धैर्य रखना चाहिए। थलपति कोई जादूगर नहीं हैं। तमिलनाडु में द्रमुक और अन्ना-द्रमुक को दरकिनार कर जनता ने एक तीसरा विकल्प चुना है। दक्षिण के एक राज्य में थलपति की जीत से एक नया अध्याय जरूर शुरू हुआ है, लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं है कि वहां तुरंत कोई चमत्कार हो जाएगा। तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने कहा है, ‘हम सरकार को छह महीने का समय दे रहे हैं। छह महीने तक सरकार पर कोई आलोचना नहीं की जाएगी और उन्हें काम करने का पूरा मौका दिया जाएगा।’ स्टालिन का यह कथन पूरी तरह उचित है। जहां स्टालिन आलोचना नहीं करेंगे, वहीं थलपति के भक्तों को भी नए मुख्यमंत्री के भजन गाना बंद करना चाहिए। थलपति के भक्तों ने अब यह ढिंढोरा पीटना शुरू कर दिया है कि उन्होंने गुलामी का एक प्रतीक हटा दिया है। आखिर थलपति ने ऐसा क्या बड़ा काम कर दिया? तमिलनाडु में मुख्य नेता और अधिकारी अपनी कुर्सियों पर सफेद तौलिया डालकर बैठते थे। खुद को दूसरों से अलग और खास दिखाने का यह एक ब्रिटिश तरीका था। थलपति ने इस सफेद तौलिये को हटा दिया और गुलामी के प्रतीक को नकार दिया, जिसकी उनके भक्तों द्वारा बढ़ा-चढ़ाकर प्रशंसा की जा रही है। यह कुछ ज्यादा ही हो रहा है। राज्य का मुख्यमंत्री या देश का प्रधानमंत्री लोकतंत्र में एक तरह से राजा ही होता है। राजा चाहे जाजिम पर बैठे या चटाई पर, उसका अधिकार और रुतबा वही रहता है। प्रधानमंत्री मोदी भी खुद को ‘फकीर’ कहते हैं। वे अपनी कुर्सी पर सफेद तौलिया डालकर नहीं बैठते, बल्कि समय-समय पर गुलामी के खिलाफ उपदेश देते रहते हैं। उन्होंने भारत की ऐतिहासिक संसद को बदल दिया, क्योंकि उनका मानना था कि यह इमारत ब्रिटिश गुलामी का प्रतीक थी। हकीकत तो यह है कि इसी इमारत में भारतीय स्वतंत्रता और संविधान निर्माण का समझौता हुआ था। इस लिहाज से पुरानी संसद इतिहास की गवाह थी इसलिए उस इमारत पर गुस्सा निकालने का कोई औचित्य नहीं था, लेकिन मोदी ने निकाला। उनके द्वारा बनाई गई
संसद की नई इमारत ने
अभी तक कोई इतिहास नहीं रचा है। मोदी ने साउथ ब्लॉक का कार्यालय बदलकर नया कार्यालय बनवाया, क्योंकि पुराना कार्यालय भी उनकी नजर में गुलामी का प्रतीक था। प्रधानमंत्री को ऐसा लगता है इसलिए राजधानी की ऐतिहासिक इमारतें गुलामी का प्रतीक बन जाती हैं, यह एक चिंताजनक बात है। प्रधानमंत्री के इसी पुराने कार्यालय से इंदिरा गांधी ने १९७१ के युद्ध में पाकिस्तान को करारी शिकस्त देकर उसके दो टुकड़े किए थे और बांग्लादेश का निर्माण कर एक नया इतिहास रचा था। पाकिस्तान के टुकड़े किए और उसे कंगाल बना दिया, क्या यह सब प्रधानमंत्री मोदी को गुलामी का प्रतीक लगता है? किसी इमारत की महत्ता उसकी वास्तुकला से ज्यादा इस बात पर निर्भर करती है कि उस इमारत में बैठकर शासन करनेवाला नेता कितना शक्तिशाली, निडर और दूरदर्शी है। केवल बाघ की तरह दहाड़ना और राष्ट्रपति ट्रंप के आंख दिखाते ही पाकिस्तान के साथ लड़ाई रोक देना, ऐसे कृत्यों से इतिहास सिर्फ गुलामी के दौर को ही याद रखेगा। इसलिए नई इमारतें बनाने या कुर्सी से सफेद तौलिया हटाने से गुलामी के निशान नहीं मिटते। भारतीय राजनीति में अक्सर नए युग की शुरुआत होती है, लेकिन वे जितनी तेजी से शुरू होती हैं, उतनी ही तेजी से अचानक समाप्त भी हो जाती हैं। जैसे १९७८ में इंदिरा गांधी को हराकर जनता पार्टी ने एक नए युग का आरंभ किया था। यह दौर दो-ढाई साल से ज्यादा नहीं चल सका और नेताओं की मूर्खता के कारण सबकुछ बिखर गया। प्रधानमंत्री मोदी पिछले १२ वर्षों से भारतीय सत्ता के मालिक बने हुए हैं। इस कड़वे सच से इनकार नहीं किया जा सकता कि इस मालिक ने देश के लोकतंत्र, न्याय व्यवस्था और चुनाव आयोग को अपना गुलाम बना लिया है। जब लोगों के मुंह से यह हताशा भरे शब्द सुनने को मिलते हैं कि ऐसी तानाशाही से तो ब्रिटिश शासन ही बेहतर था, तब निश्चित रूप से भारत माता को भी गहरी पीड़ा होती होगी। ब्रिटिश काल में भारतीय युवाओं को कीड़े, मकोड़ों और कॉकरोच की तरह समझा जाता था और उन्हें कुचल दिया जाता था। क्रांतिकारी युवाओं को बेरहमी से मिटा दिया जाता था। आज भी भारत के मुख्य न्यायाधीश युवाओं को कॉकरोच समझते हैं, जो पूरी तरह साम्राज्यवादी और मालिकाना हक वाली मानसिकता को दर्शाता है। कुर्सियों पर
सफेद तौलिया
न रखकर भी ऐसे बयान दिए जाते हैं इसलिए सफेद तौलिये को बेवजह बदनाम करने का क्या मतलब है? यह एक महत्वपूर्ण सवाल है। थलपति ने अपनी कुर्सी पर सफेद तौलिया नहीं रखा, यह उनकी अपनी मर्जी है। लेकिन कुर्सी पर सफेद तौलिया न होने के बावजूद देश में जो काले धंधे चल रहे हैं, वे सब ब्रिटिश काल के गुलामी के शासन में भी जारी थे। थलपति ने जल्दबाजी में कुछ फैसले लिए, जिनमें शराबबंदी लागू करना शामिल है। क्या इस फैसले से लोग शराब पीना बंद कर देंगे? लोग चोरी-छिपे शराब पिएंगे, जिससे अवैध शराब का धंधा और बढ़ेगा तथा राज्य को राजस्व का भारी नुकसान होगा, वह अलग। गुजरात में शराबबंदी लागू है, लेकिन वहां एक अलग ही नशे का बाजार सक्रिय है। अवैध शराब की बिक्री गुजरात का एक बड़ा आर्थिक कारोबार बन चुकी है। इसके अलावा, गुजरात के ‘मुंद्रा’ पोर्ट पर सबसे ज्यादा नशीले पदार्थ उतरते हैं और वहीं से पूरे देश में सप्लाई होते हैं। बिना शराब पिए भी वहां के राजनीतिक व्यापारी देश में जो कोहराम मचा रहे हैं, उसका क्या करेंगे? थलपति ने तमिलनाडु में वीवीआईपी संस्कृति को खत्म करने का फैसला किया है। यह फैसला तो प्रधानमंत्री मोदी ने भी लिया था, जहां वे खुद को एकमात्र ‘वीवीआईपी’ मानते हैं और बाकी सब कोई मायने नहीं रखते। पचास-सौ गाड़ियों का काफिला, २० हजार करोड़ का विमान, १० लाख का सूट, चश्मा और पेन जैसी विदेशी चीजें केवल उनके उपयोग के लिए हैं, जबकि बाकी लोगों को गरीब देवता यानी दरिद्र नारायण की पूजा कर राष्ट्र सेवा करने की सीख दी जाती है। ये थलपति से पहले भारत में घटित हो चुका है। शासन करने का यह सही तरीका नहीं है। ढोंग और स्वांग सिर्फ अंधभक्तों की फौज खड़ी करते हैं, जिससे देश का कोई भला नहीं होता। इसलिए सही तरीके से शासन कीजिए, फिजूलखर्ची कम कीजिए और जनहित के पैâसलों को लागू कीजिए। कथनी और करनी का यह अंतर अब बंद होना चाहिए। लोगों से झूठ बोलकर और मुख्य रूप से लोकतंत्र की हत्या करके ‘कुर्सी’ को लहूलुहान मत कीजिए। जो व्यक्ति इस बात का ध्यान रखता है कि वह कुर्सी का मालिक नहीं बल्कि एक ट्रस्टी या कस्टोडियन है, वही सच्चा लोकनेता बनता है। आज देश पर पाखंडियों का राज है। थलपति को इस पाखंड का रास्ता नहीं चुनना चाहिए। उन्हें अपने भक्तों से सावधान रहना चाहिए, भक्तों का क्या ये कल आपको ‘ईसा’ का नया अवतार भी घोषित कर दें!
