सना खान
आज हर इंसान खुशी ढूंढ रहा है।
कोई पैसे में, कोई रिश्तों में, कोई सफलता में, तो कोई दूसरों की तारीफ में। हर कोई सोचता है कि बस ‘कुछ और’ मिल जाए, फिर जिंदगी पूरी हो जाएगी। लेकिन सच यह है कि इंसान जितना बाहर खुशी तलाश करता है, उतना ही अंदर से खाली होता जाता है। शायद खुशी वही होती है, जब थका हुआ इंसान घर आकर चैन से बैठ जाए, जब मां बिना पूछे हाल समझ जाए, जब पिता अपनी परेशानी छुपाकर सिर्फ इतना कह दें – ‘सब ठीक हो जाएगा।’ शायद खुशी बहुत बड़ी चीज नहीं होती। वो बस उन लोगों के साथ होने का एहसास होती है,
जहां इंसान को खुद होने के लिए कोई अभिनय न करना पड़े। आज की दुनिया में लोग जी कम रहे हैं और दिखा ज्यादा रहे हैं। सोशल मीडिया ने जिंदगी को एक ऐसी दौड़ बना दिया है, जहां हर इंसान दूसरे की मुस्कान देखकर अपनी जिंदगी अधूरी समझने लगा है। हर तस्वीर में चमक है, हर चेहरे पर हंसी है, लेकिन उन तस्वीरों के पीछे कितनी बेचैनी, कितनी थकान और कितना अकेलापन छिपा है – यह कोई नहीं देखता। कुछ लोग दिनभर सबको हंसाते हैं और रात में अकेले चुपचाप टूट जाते हैं। कई लोग पूरी जिंदगी पैसा कमाने में लगा देते हैं,
लेकिन जब सुकून खरीदने की बारी आती है, तब समझ आता है कि खुशी कभी पैसों की गुलाम नहीं थी।
कई बार सबसे महंगी गाड़ी में बैठा इंसान भी अंदर से टूट चुका होता है और कई बार फुटपाथ पर बैठा कोई गरीब इंसान चैन की नींद सो जाता है। फर्क सिर्फ परिस्थितियों का नहीं होता, फर्क सोच और संतोष का होता है। जिस इंसान ने छोटी-छोटी चीजों में सुकून ढूंढ लिया, वह जिंदगी की बड़ी तकलीफों में भी पूरी तरह टूटता नहीं। कभी मां के हाथ की चाय में खुशी छिपी होती है, कभी पिता की आवाज में हिम्मत मिल जाती है, कभी किसी अपने का ‘तुम ठीक हो न?’ पूछ लेना भी इंसान को अंदर से संभाल लेता है।
और कभी देर रात अकेले बैठकर चुपचाप रो लेने के बाद खुद को फिर से संभाल लेना भी जिंदगी की एक छोटी जीत बन जाता है। सच तो यह है कि इंसान दुखों से उतना नहीं टूटता, जितना अपनी उम्मीदों और तुलना से टूट जाता है। आज लोग अपनी जिंदगी से ज्यादा दूसरों की जिंदगी देखकर परेशान हैं। दूसरों की सफलता उन्हें अपनी हार लगने लगी है। लेकिन जिंदगी तुलना से नहीं, स्वीकार करने से आसान होती है।
हर इंसान की जिंदगी में कोई न कोई कमी जरूर होती है। किसी के पास पैसा है, लेकिन अपनापन नहीं। किसी के पास रिश्ते हैं, लेकिन सुकून नहीं। किसी के पास नाम है, लेकिन नींद नहीं। इसलिए पूरी जिंदगी शायद किसी की भी पूरी नहीं होती। असल खुशी तब मिलती है, जब इंसान खुद को दूसरों की नजरों से नहीं, अपनी आत्मा की शांति से देखना शुरू कर देता है। जब उसे यह समझ आने लगता है कि जिंदगी ‘सब कुछ पा लेने’ का नाम नहीं, बल्कि ‘जो है उसे महसूस कर पाने’ का नाम है।
क्योंकि जिंदगी हमेशा परफेक्ट नहीं होगी। हर दिन आसान नहीं होगा। कुछ दिन थकाएंगे, कुछ लोग रुलाएंगे, कुछ रिश्ते बदल जाएंगे। लेकिन हर अंधेरे दिन में भी एक छोटी सी वजह जरूर होगी जीने की। खुशी कोई मंजिल नहीं, खुशी तो सफर का वह एहसास है, जो छोटे-छोटे पलों में चुपचाप मिल जाता है। शायद इस बात को कुछ पंक्तियों में सबसे बेहतर समझा जा सकता है- खुशी हर किसी के हिस्से में आती है,
बस हर कोई उसे समझ नहीं पाता है,
कोई दुनिया की भीड़ में खो जाता है,
कोई छोटे पलों में सुकून पा जाता है।
कभी मां की दुआ में मिल जाती है,
कभी अपनों की आवाज में बस जाती है,
जो दिल से जिंदगी को महसूस कर ले,
खुशी उसी के चेहरे पर नजर आती है।
