भारतीय जनता को किफायत बरतने और विदेशी दौरों से बचने का उपदेश देकर स्वयं प्रधानमंत्री मोदी सात देशों के दौरे पर निकल गए। मूर्ख बनाने का यह खेल सिर्फ हमारे प्रधानमंत्री मोदी ही कर सकते हैं। भारतीय जनता को मूर्ख बनाने के मामले में वे अद्भुत रूप से साहसी हैं, लेकिन उनके इस साहस को नॉर्वे की एक महिला पत्रकार हेले लेंग ने उलटकर रख दिया है। इसके कारण दुनियाभर में भारतीय लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मजाक उड़ा। मोदी के अंधभक्तों को इस बारे में क्या लगता है? नॉर्वे में प्रधानमंत्री मोदी पत्रकारों के सवालों के जवाब दिए बिना ही मंच से चले गए। पत्रकार हेले लेंग ने मोदी से पूछा, `मिस्टर प्राइम मिनिस्टर, आप दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के नेता हैं और हम दुनिया के पहले नंबर के `प्रेस प्रâीडम’ (प्रेस स्वतंत्रता) वाले देश हैं, आप हमारे सवालों के जवाब देने से क्यों कतरा रहे हैं?’ इस सवाल का जवाब देने के बजाय मोदी वहां से अक्षरश: भाग रहे हैं, यह दृश्य उस समय दुनियाभर के मीडिया ने अपने वैâमरों में वैâद किया। मोदी ने पत्रकारों के सवालों के जवाब कभी नहीं दिए। वे बारह वर्षों से प्रधानमंत्री हैं। इस दौरान उन्होंने एक बार भी पत्रकारों को सवाल पूछने का मौका नहीं दिया। प्रधानमंत्री जनसभाओं, रैलियों और रोड शो में हिस्सा लेते हैं। विरोधियों पर एकतरफा तीखा प्रहार करने वाले भाषण देकर चले जाते हैं। उन्होंने जो कुछ इंटरव्यू दिए, वे भी अपने ही चमचों को दिए। रिकॉर्ड में दर्ज है कि अक्षय कुमार ने उनका एक इंटरव्यू लिया था। उसमें अक्षय कुमार ने उनसे सवाल पूछा था कि, `मोदी साहब, आप आम चूसकर खाते हैं या काटकर?’ मोदी को ऐसे सवाल पसंद हैं, लेकिन विफल `ऑपरेशन सिंदूर’, चुनाव आयोग की गड़बड़ी, सुप्रीम कोर्ट पर दबाव, मृत होता भारतीय रुपया, आर्थिक मंदी और लोकतंत्र के राज में हो रहा मानवाधिकारों का उल्लंघन, इन विषयों पर
सवाल पूछने का मौका
प्रधानमंत्री किसी को भी नहीं देते। इंदिरा गांधी ४३ साल पहले नॉर्वे गई थीं और उन्होंने वहां के प्रधानमंत्री के साथ संयुक्त पत्रकार वार्ता की थी। नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक प्रत्येक प्रधानमंत्री पत्रकारों को जवाब देते थे। विपक्ष के नेता राहुल गांधी अब तक १५० पत्रकार वार्ताएं कर चुके हैं। मोदी के आदर्श राष्ट्रपति ट्रंप तो रोज ही पत्रकारों से संवाद करते हैं। फिर प्रधानमंत्री मोदी ही पत्रकारों के सवाल क्यों बर्दाश्त नहीं कर पाते? मोदी के दौर में भारत का मीडिया `गोदी मीडिया’ बन गया, यह सच है, लेकिन रीढ़ की हड्डी रखने वाले कई पत्रकार आज भी भारत में काम कर रहे हैं। वे सरकार के दबाव में आने को तैयार नहीं हैं। ऐसे पत्रकारों को मोदी और उनके लोगों ने देश का दुश्मन घोषित कर दिया है। भारतीय लोकतंत्र और प्रेस की स्वतंत्रता की यह वर्तमान स्थिति है। भारत की प्रेस स्वतंत्रता का मुखौटा नॉर्वे के मंच पर उतर गया है। `नॉर्वे वासी’ पत्रकार ने एक सवाल पूछा और मोदी के पसीने छूट गए। यदि कोई दूसरा ५६ इंच के सीने वाला प्रधानमंत्री होता, तो वह पत्रकार हेले लेंग के तीखे सवालों पर रुकता और जवाब देकर जाता। इससे भारतीय लोकतंत्र की प्रतिष्ठा बनी रहती। नॉर्वे में मोदी भारतीय पहनावे में थे। यानी कुर्ता, नीचे तंग चूड़ीदार पाजामा, जैकेट आदि, लेकिन वहां से जब मोदी इटली पहुंचे तो उनकी पोशाक पूरी तरह बदल गई। इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी के साथ उनकी तस्वीरें सामने आर्इं। उसमें मोदी महंगे सूट में दिखाई दे रहे हैं और मेलोनी को भारत से ले जाई गई टॉफियां भेंट कर रहे हैं। अन्य सभी देशों में मोदी भारतीय पहनावा पहनकर संस्कृति के दर्शन कराते हैं, लेकिन इटली की `मेमसाहब’ से मिलने जाते समय `सूट’ पहनकर `साहब’ बन जाते हैं, यह एक रहस्य ही है। मोदी ने इटली की मेलोनी को मेलोडी चॉकलेट भेंट की, लेकिन उन्होंने अन्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों को क्या उपहार दिए, यह सामने नहीं आया। भारतीय जनता को किफायत बरतने की सलाह देकर जनता के
राजा का यूरोपीय दौरे पर
जाकर अन्य राजाओं को उपहार देना, क्या यह ढोंग भाजपा के राष्ट्रभक्तों को स्वीकार्य है? अब फिर से नॉर्वे की ओर रुख करते हैं। नॉर्वे में प्रधानमंत्री मोदी से सवाल पूछने के बाद चर्चा में आर्इं पत्रकार हेले लेंग ने दावा किया है कि उनका फेसबुक अकाउंट और इंस्टाग्राम अकाउंट `सस्पेंड’ कर दिया गया है। अच्छा हुआ, हेले मैडम थोड़े में ही बच गर्इं। अगर किसी भारतीय पत्रकार ने मोदी से ऐसा सवाल पूछा होता, तो अब तक ईडी और सीबीआई की टीमें उनके घर पहुंचकर छापेमारी शुरू कर चुकी होतीं। भारत में पत्रकारिता की यह दयनीय स्थिति है। `नॉर्वे प्रकरण’ में राहुल गांधी एक गंभीर मुद्दे को सामने लाए हैं। नॉर्वे सरकार ने फरवरी २०२६ से `गवर्नमेंट पेंशन फंड ग्लोबल’ (Government Pension Fund Global) से (Adani Green Energy) अडानी ग्रीन एनर्जी’ को बाहर का रास्ता दिखा दिया और उसे काली सूची में डाल दिया। भ्रष्टाचार और वित्तीय हेराफेरी के आरोप अडानी की कंपनियों पर हैं। यह फंड दुनिया का सबसे बड़ा `सॉवरेन वेल्थ फंड’ है। भारत का इसमें २८ बिलियन डॉलर का निवेश है। मई २०२४ में (Adani Ports) `अडानी पोर्ट्स’ को भी मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों के तहत इस `फंड’ से बाहर निकाल दिया गया था। नॉर्वे के पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों का दृढ़ता से मानना है कि ४३ वर्षों के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने नॉर्वे का दौरा सिर्फ इसलिए किया, ताकि अडानी समूह को इस `काली सूची’ से बाहर निकाला जा सके। जैसे अमेरिका ने अडानी पर लगे भ्रष्टाचार के मामले वापस ले लिए, वैसे ही `नॉर्वे’ मंडली भी प्रिय अडानी पर लगे मामले वापस ले लें, इसी उद्देश्य से प्रधानमंत्री मोदी
नॉर्वे आए थे। लेकिन इस दौरे पर पत्रकार हेले लेंग के एक सवाल ने पानी फेर दिया। मोदी का वहां से चले जाना ही दुनियाभर में चर्चा का विषय बन गया। मोदी इस समय इटली में मिसेस मेलोनी के साथ `सूट-बूट’ वाले पहनावे में हैं। मोदी की राजनीति में यही `मेलोडी’ है। जो काम भारतीय पत्रकार नहीं कर सके, वह `नॉर्वे वासियों’ ने कर दिखाया! उनका आभार!!
