मुख्यपृष्ठस्तंभविशेष रिपोर्ट: सवाल पीछा नहीं छोड़ते!

विशेष रिपोर्ट: सवाल पीछा नहीं छोड़ते!

-असहज होती सत्ता और प्रेस का रुख

-२०२३ में अमेरिका में भी प्रधानमंत्री से सवाल पूछने वाली पत्रकार सबरीना सिद्दीकी को ऑनलाइन हमलों का सामना करना पड़ा था। यह बताता है कि समस्या केवल एक घटना की नहीं, बल्कि सत्ता-समर्थक डिजिटल भीड़ की कार्यशैली की भी है।

-लोकतंत्र केवल संस्थाओं की उपस्थिति से नहीं, बल्कि उनके स्वतंत्र इस्तेमाल की वास्तविक क्षमता से मापा जाता है। यदि पत्रकार सवाल पूछने पर ट्रोलिंग, ऑनलाइन हमले, कानूनी दबाव या सामाजिक अपमान का सामना करें, तो यह लोकतंत्र की सेहत के लिए गंभीर है।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा चुनावी रैलियों में नहीं, बल्कि असहज सवालों के सामने होती है। सत्ता जब तालियां सुनती है, तब वह मजबूत दिखाई देती है; लेकिन जब वही सत्ता पत्रकारों के सीधे सवालों से बचती है, तब उसके आत्मविश्वास पर प्रश्नचिह्न लग जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यूरोप यात्रा के दौरान नीदरलैंड और नॉर्वे में जो घटनाक्रम सामने आया, उसने एक बार फिर भारत में प्रेस स्वतंत्रता, जवाबदेही और सत्ता की संवाद-शैली पर बहस तेज कर दी है।
नॉर्वे में पत्रकार हेले लेंग उस समय चर्चा में आईं, जब उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के ही समक्ष, सवाल न लेने का मुद्दा उठाया। ओस्लो में संयुक्त मीडिया कार्यक्रम के दौरान लेंग ने मोदी से सवाल लेने की अपील की, लेकिन उन्हें जवाब नहीं मिला। बाद में उन्होंने एक्स पर दावा किया कि ऑनलाइन विरोध और ट्रोलिंग के बीच उनके इंस्टाग्राम और फेसबुक अकाउंट सस्पेंड हो गए। उन्होंने इसे ‘प्रेस स्वतंत्रता के लिए छोटी सी कीमत’ बताया। पर इस घटनाक्रम ने देश दुनिया में एक बहस छेड़ दी।
यह घटना अकेली नहीं थी। इससे पहले नीदरलैंड के द हेग में भारतीय अधिकारियों को डच पत्रकारों के तीखे सवालों का सामना करना पड़ा। सवाल उठाया गया कि दोनों प्रधानमंत्रियों ने साथ मिलकर पत्रकारों के खुले सवालों का सामना क्यों नहीं किया। भारत में प्रेस की स्वतंत्रता पर भी प्रश्न उठा। माहौल में तल्खी भी आई। प्रेस स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों को लेकर उठी आलोचनाओं को खारिज किया गया, लेकिन विवाद समाप्त नहीं हुआ। एक अन्य डच पत्रकार ने स्पष्ट किया कि यह चिंता केवल पत्रकारों की निजी राय नहीं, बल्कि डच प्रधानमंत्री की टिप्पणी से जुड़ी है तो भारतीय अधिकारी ने कहा कि उन्होंने वह बयान नहीं सुना। यह जवाब कूटनीतिक रूप से सावधानीपूर्ण था, लेकिन पत्रकारिता के नजरिए से बड़ा हो गया कि यदि भारत सचमुच आत्मविश्वासी लोकतंत्र है, तो उसे खुले सवालों से परहेज क्यों? भारत में लोकतंत्र मजबूत है। नागरिकों को अपनी राय रखने का संवैधानिक अधिकार है तो सवालों पर चुप्पी क्यों?
लोकतंत्र केवल संस्थाओं की उपस्थिति से नहीं, बल्कि उनके स्वतंत्र इस्तेमाल की वास्तविक क्षमता से मापा जाता है। यदि पत्रकार सवाल पूछने पर ट्रोलिंग, ऑनलाइन हमले, कानूनी दबाव या सामाजिक अपमान का सामना करें, तो यह लोकतंत्र की सेहत के लिए गंभीर है। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स २०२६ की प्रेस प्रâीडम इंडेक्स में भारत १८० देशों में १५७वें स्थान पर है। आरएसएफ के अनुसार, भारत का २०२६ स्कोर ३१.९६ है और उसे ‘वैरी सीरियस’ श्रेणी में रखा गया है। यह रैंकिंग भारत जैसे बड़े लोकतंत्र के लिए असहज संकेत है, खासकर तब जब हम स्वयं ‘लोकतंत्र की जननी’ कहलाना पसंद करते हैं। हम विदेशी पत्रकारों के सवालों को भी वैचारिक हमले या राष्ट्र-विरोधी मानसिकता के रूप में देखते हैं। उनका काम सत्ता से सवाल पूछना है, चाहे वह सत्ता किसी देश की हो। यह असम्मान नहीं; बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादा का हिस्सा है। असहमति को अपमान और सवाल को साजिश समझना लोकतंत्र को कमजोर करता है। सरकार की विदेश व आर्थिक नीतियों या वैश्विक छवि पर समर्थक और आलोचक अपने-अपने तर्क दे सकते हैं। लेकिन प्रेस से दूरी, नियंत्रित संवाद, चुने हुए मंचों पर बयान और असहज सवालों से बचाव, ये उस छवि को कमजोर करते हैं, जिसे भारत विश्व मंच पर मजबूत लोकतंत्र के रूप में प्रस्तुत करता है। सोशल मीडिया पर भीड़तंत्र जैसा माहौल बनना अब वैश्विक समस्या है। भारत से जुड़े मामलों में तो यह प्रवृत्ति अधिक तीखी है। २०२३ में अमेरिका में भी प्रधानमंत्री से सवाल पूछने वाली पत्रकार सबरीना सिद्दीकी को ऑनलाइन हमलों का सामना करना पड़ा था। यह बताता है कि समस्या केवल एक घटना की नहीं, बल्कि सत्ता-समर्थक डिजिटल भीड़ की कार्यशैली की भी है। लेंग का दावा जांच और पुष्टि का विषय हो सकता है, लेकिन उससे उठे सवाल वास्तविक हैं। क्या सत्ता को सवालों से डरना चाहिए? क्या प्रधानमंत्री को खुले पत्रकार संवाद से बचना चाहिए? क्या लोकतंत्र की मजबूती का दावा केवल चुनावी आंकड़ों से सिद्ध हो सकता है या उसे स्वतंत्र प्रेस के सामने जवाबदेही से भी गुजरना चाहिए?
लोकतंत्र में प्रेस विरोधी नहीं, आईना होती है। आईना कभी-कभी कठोर दिखाता है, लेकिन चेहरा तो वही होता है जो सामने हो। हम यदि सचमुच विश्वगुरु और लोकतंत्र की जननी होने का दावा करते हैं, तो आलोचनात्मक सवालों को अपमान नहीं, लोकतांत्रिक अवसर मानना होगा। क्योंकि सवालों से भागती सत्ता अंतत: अपने ही दावों से घिर जाती है।

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