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तृणमूल में तिलमिलाहट क्यों?

बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर जो बेचैनी दिखाई दे रही है, वह केवल हार की स्वाभाविक निराशा नहीं, बल्कि लंबे समय से दबे संगठनात्मक संकट का संकेत है। शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में भाजपा की जीत और ममता बनर्जी की पराजय ने तृणमूल के उस आत्मविश्वास को तोड़ा है, जो वर्षों तक सत्ता, संगठन और व्यक्तित्व-केंद्रित राजनीति के सहारे बना रहा था। नंदीग्राम से शुभेंदु अधिकारी की जीत दर्ज होने और ममता बनर्जी की हार से सत्ता परिवर्तन का निर्णायक क्षण आने के बाद से परिस्थितियां लगातार बदल रही हैं। कालीघाट की बैठक में १५ विधायकों की अनुपस्थिति और अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली पर सवाल इस बात का प्रमाण हैं कि तृणमूल में अब नेतृत्व को एकरेखीय पकड़ मजबूत करनी होगी। कुणाल घोष जैसे नेताओं द्वारा ‘खुली हवा’ की मांग करना बताता है कि पार्टी के भीतर संवाद की जगह आदेश की संस्कृति ने असंतोष को जन्म दिया है। जहांगीर खान प्रकरण ने इस असंतोष को और धार दी, क्योंकि कार्यकर्ताओं और विधायकों में यह संदेश गया कि करीबी नेताओं के लिए अनुशासन के पैमाने अलग हैं।
तृणमूल के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब विपक्ष में रहते हुए संगठन को बचाए रखना है। सत्ता में रहते हुए असंतोष दब जाता है, लेकिन सत्ता जाते ही वही असंतोष दल-बदल, निष्क्रियता और सार्वजनिक बगावत में बदल सकता है। शुभेंदु अधिकारी स्वयं दिसंबर २०२० में तृणमूल छोड़कर भाजपा में आए थे; इसलिए तृणमूल नेतृत्व जानता है कि एक बड़ा नेता जब टूटता है तो उसके साथ जनाधार और कार्यकर्ता भी खिसकते हैं। कुल मिलाकर, यह बैठक तृणमूल की समीक्षा कम और आने वाले राजनीतिक क्षरण की चेतावनी अधिक दिखती है।

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