मुख्यपृष्ठस्तंभपरमाणु हादसे की कीमत ३,००० करोड़ कैसे तय होगी?

परमाणु हादसे की कीमत ३,००० करोड़ कैसे तय होगी?

-सरकारी मंशा पर सुप्रीम कोर्ट में सवाल

परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में किसी अप्रिय दुर्घटना की स्थिति में मुआवजे की अधिकतम सीमा तय करने के केंद्र सरकार के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता ई. ए. एस. शर्मा और अन्य ने शांति अधिनियम, २०२५ के प्रावधानों पर सवाल उठाते हुए कहा है कि परमाणु हादसे जैसी भयावह स्थिति में नुकसान की भरपाई कुछ हजार करोड़ रुपए की सीमा में नहीं बांधी जा सकती।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी कि चेरनोबिल और फुकुशिमा जैसी दुर्घटनाओं ने साबित किया है कि परमाणु हादसों का नुकसान कई लाख करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है। ऐसे में यदि कानून के माध्यम से ऑपरेटर या निजी कंपनियों की देयता सीमित कर दी जाती है, तो दुर्घटना की असली कीमत आम नागरिकों और करदाताओं को चुकानी पड़ेगी। याचिका में यह भी आशंका जताई गई है कि देयता सीमित होने से सुरक्षा मानकों में ढिलाई और निजी कंपनियों की जवाबदेही कमजोर हो सकती है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने मामले को अत्यंत संवेदनशील विधायी और नीतिगत मुद्दा बताया। अदालत ने कहा कि सरकार आर्थिक और ऊर्जा नीति बना सकती है, लेकिन यदि किसी दुर्घटना में नागरिकों को जान-माल का नुकसान होता है, तो अदालतों को उचित मुआवजा तय करने से रोका नहीं जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे संकेत मिलता है कि नागरिकों के जीवन, सुरक्षा और संपत्ति के अधिकार को केवल निवेश आकर्षित करने की दलील देकर सीमित नहीं किया जा सकता। अब यह मामला केवल परमाणु ऊर्जा नीति का नहीं, बल्कि सरकार की मंशा, कॉरपोरेट जवाबदेही और नागरिक सुरक्षा से जुड़े बड़े संवैधानिक सवाल का रूप ले चुका है।

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