ईरान में चरमपंथी धार्मिक कट्टरवाद के खिलाफ एक क्रांति की चिंगारी भड़क उठी है। देखते-देखते यह चिंगारी अब भीषण आग की तरह फैल गई है और पिछले बारह दिनों से पूरा ईरान जल उठा है। जनता और सरकार की पुलिस एवं सुरक्षा बलों के बीच एक तरह का युद्ध छिड़ गया है। ईरान भर में अराजकता फैल गई है। हर जगह आगजनी, हिंसा और सरकारी इमारतों पर हमले हो रहे हैं। निस्संदेह, यह सवाल कि क्या ईरानी जनता ने वास्तव में क्रांति की इस चिंगारी को भड़काने में भूमिका निभाई या फिर पूरी दुनिया का खलीफा बनने का सपना देखनेवाले अमेरिका ने इस आग को हवा दी, इसका जवाब जल्द ही मिल जाएगा। इसके अलावा, ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्ला अली खुमैनी ने इस आंदोलन को कुचलने के लिए ‘शूट एट साइट’ का आदेश जारी किया, जिससे आग में घी ही डाला गया। अब तक प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों द्वारा दो हजार से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी और हजारों प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी ने आंदोलन को शांत नहीं किया है, बल्कि इसे और तेज कर दिया है। ईरान के सौ से अधिक शहरों में लोग सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं। हजारों ईरानी नागरिक गोलीबारी और मौत की परवाह किए बिना आंदोलन में भाग ले रहे हैं और ‘तानाशाही खत्म करो’ और ‘डेथ टू खुमैनी’ जैसे नारे लगा रहे हैं। ईरानी नागरिकों का उग्र व्यवहार स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि वे किसी भी कीमत पर सत्ता परिवर्तन चाहते हैं। सड़कों पर शुरू हुई यह आग अब सत्ता के द्वार तक पहुंच गई है। ईरानी सरकार दस दिनों से विरोध प्रदर्शनों को बढ़ने से रोकने के लिए
इंटरनेट बंद
कर रखा है। हालांकि, अमेरिका के ‘स्टारलिंक’ सेटेलाइट इंटरनेट के जरिए ईरान में प्रदर्शनकारी सोशल मीडिया का उपयोग संदेशों का आदान-प्रदान करने और सरकार को चुनौती देने के लिए कर रहे हैं, जिसके चलते दमनकारी गतिविधियों की जानकारी पैâलने के साथ ही यह हिंसक आंदोलन दिन-प्रतिदिन और तीव्र होता जा रहा है। प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांग है कि खुमैनी को मार डाला जाए और निर्वासित ईरानी राजकुमार रजा पहलवी को वापस देश में लाया जाए तथा ईरान की सत्ता उन्हें सौंप दी जाए। लोगों की दूसरी मांग है कि ईरान में कट्टरपंथ का अंत किया जाए और सुधारवादी विचारों के साथ ईरान को प्रगति के पथ पर अग्रसर किया जाए। हिजाब के बिना बाहर निकलने वाली महिलाओं को मौत की सजा सुनानेवाले खुमैनी के खिलाफ ईरानी महिलाएं भी सड़कों पर उतर आई हैं। हिजाब के बिना बाहर निकलने वाली महिलाएं सिगरेट से खुमैनी के पोस्टर जला रही हैं। हालांकि, यह सतही संघर्ष सख्त प्रतिबंधों के कट्टरपंथ और सुधारवाद के बीच का संघर्ष प्रतीत होता है, लेकिन यह कहना गलत नहीं होगा कि यह आंदोलन अमेरिका और इजरायल की साजिश का नतीजा नहीं है। जिस तरह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान में सरकार विरोधी दंगों, आगजनी और प्रदर्शनों की प्रशंसा कर रहे हैं, उससे स्पष्ट है कि यह सब अमेरिका के इशारे पर हो रहा है। राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा, ‘ईरानी शासन को उखाड़ फेंकने के लिए सड़कों पर उतरे प्रदर्शनकारियों का जोश अविश्वसनीय है।’ ट्रंप यहीं नहीं रुके, बल्कि उन्होंने ईरानी प्रदर्शनकारियों को सरकारी संस्थानों पर कब्जा करने का निर्देश दिया। राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा, ‘अमेरिका आपके साथ है, आपकी मदद के लिए अमेरिका की रसद जल्द ही पहुंच रही है।’ राष्ट्रपति ट्रंप के इस तरह के बयानों ने ईरान की आग में
घी डालने का काम
किया है। इजरायल के साथ हाल ही में हुए बारह दिवसीय युद्ध के बाद ईरान की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त हो गई है। इसके अलावा, ईरान के परमाणु हथियार कार्यक्रम पर अमेरिका द्वारा लगाए गए वर्षों के प्रतिबंधों ने ईरान की अर्थव्यवस्था को पंगु बना दिया है। जिसकी वजह से ईरानी जनता में सरकार और उसके सर्वोच्च धार्मिक नेता, अयातुल्ला अली खुमैनी के प्रति गहरा असंतोष है। हालांकि, आज ईरान में जो अशांति पैâली है, वह मुख्य रूप से ध्वस्त अर्थव्यवस्था या मुद्रास्फीति के कारण नहीं है। वहां के लोगों का एजेंडा ईरान में कट्टरपंथी इस्लामी शासन को उखाड़ फेंकना भी प्रतीत होता है। ईरान की जनता ने १९७९ में राजशाही के विरुद्ध पहली क्रांति की और पहले खुमैनी के इस्लामी शासन को देश में आरूढ किया। आज वही ईरानी जनता दूसरे खुमैनी के कट्टरपंथी इस्लामी शासन के विरुद्ध सड़कों पर उतर आई है। ईरान की जनता ने दूसरी क्रांति का बिगुल फिर से बजाया है, ताकि उसी राजा के सुधारवादी ‘प्रिंस’ को सत्ता में लाया जा सके, जिसे उन्होंने पहले उखाड़ फेंका था। ‘ईरान क्यों जला?’ इस सवाल से कहीं अधिक खतरनाक है अमेरिका द्वारा आग में घी डालने का प्रयास। ईरान जैसे तेल कुओं से समृद्ध देश आंदोलन की लपटों में जल रहा है ऐसे में वह अपनी रोटी न सेंक ले! लोकतंत्र को बचाने के बहाने अमेरिका द्वारा ईरान पर हमला करने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर, अगर ईरान भी रूस और चीन की मदद से अमेरिका को मुंहतोड़ जवाब देता है तो मध्य-पूर्व के देशों में युद्ध छिड़ सकता है। क्या दुनिया यह जोखिम उठा सकती है?
